Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 962
परवल्लिङ्गविधायकं विधिसूत्रम्
परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः
Aṣṭādhyāyī 2.4.26
Vṛtti Varadarājācārya

एतयोः परपदस्येव लिङ्गं स्यात्।

कुक्कुटमयूर्याविमे। मयूरीकुक्कुटाविमौ। अर्धपिप्पली।

वार्तिकम्- द्विगुप्राप्तापन्नालंपूर्वगतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्यः।

पञ्चसु कपालेषु संस्कृतः पञ्चकपालः पुरोडाशः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९६२- परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः। परस्य इव परवत्। द्वन्द्वश्च तत्पुरुषश्च द्वन्द्वतत्पुरुषौ, तयोर्द्वन्द्वतत्पुरुषयोः। परवत् अव्ययं, लिङ्गं प्रथमान्तं, द्वन्द्वतत्पुरुषयोः षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। यह सूत्र समास में लिङ्ग का निर्धारण करता है।

द्वन्द्व और तत्पुरुष समास में पर के पद की तरह ही लिङ्ग होता है।

द्वन्द्व और तत्पुरुष समास में सबसे अन्तिम पद का जो लिङ्ग हो, समास हो जाने के बाद उस समस्त शब्दसमुदाय का भी परवल्लिङ्ग अर्थात् वही लिङ्ग बने अर्थात् इन समासों में उत्तरपद का जो लिङ्ग, वही समास का लिङ्ग माना जाता है।

अर्धपिप्पली। पिप्पली का आधा। अर्ध पिप्पल्याः में अर्ध नपुंसकम् से समास होने के बाद यह संशय उपस्थित हुआ अर्ध इस नपुंसकलिङ्ग के अनुसार समास का लिङ्ग हो या पिप्पली इस स्त्रीलिङ्ग के अनुसार लिङ्ग हो तो परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः से परपद पिप्पली के समान स्त्रीलिङ्ग हुआ- अर्धपिप्पली। यह उदाहरण तत्पुरुष का है, द्वन्द्व का उदाहरण आगे बता रहे हैं-

कुक्कुटमयूर्यौ इमे। मुर्गा और मोरनी। कुक्कुटश्च मयूरी च लौकिक विग्रह और कुक्कुट सु+मयूरी सु अलौकिक विग्रह में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ और प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक् करने के बाद अब यहाँ पर सन्देह हुआ कि कुक्कुट इस पुल्लिङ्ग के अनुसार समस्त पद का लिङ्ग हो या मयूरी इस स्त्रीलिङ्ग के अनुसार समस्त पद का लिङ्ग हो? तो परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः से परवल्लिङ्ग अर्थात् मयूरी शब्द के समान स्त्रीलिङ्ग हुआ कुक्कुटमयूर्यौ इमे। इन्ही शब्दों को आगे पीछे करके अर्थात् विपरीत

करके मयूरी च कुक्कुटश्च करके विग्रह करने पर पुँल्लिङ्ग कुक्कुट शब्द पर है अतः उपर्युक्त नियम से कुक्कुट शब्द की तरह समास में भी पुँल्लिङ्ग ही हुआ- मयूरीकुक्कुटो इमौ।

द्विगुप्राप्तापन्नालंपूर्वगतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्यः। यह वार्तिक है। द्विगुप्रसमास एवं प्राप्त, आपन्न और अलम् पूर्व वाले तत्पुरुष समास एवं गतिसमास में परवल्लिङ्गता का निषेध कहना चाहिए।

पञ्चकपालः पुरोडाशः। पाँच पात्रों में तैयार किया हुआ पुरोडाश, हवनीय पदार्थ। पञ्चसु कपालेषु संस्कृतः यह लौकिक विग्रह और पञ्चन् सुप् कपाल सुप् यह अलौकिक विग्रह है। इस विग्रह में संस्कृतं भक्षाः से तद्धितप्रत्यय की विवक्षा में तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च से समास करके उपसर्जनसंज्ञा, पूर्वनिपात आदि होकर प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, अन्तर्वर्तिनी विभक्ति मानकर नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप करने के बाद पञ्चकपाल बना है। इस स्थिति में संस्कृतं भक्षाः सूत्र से अण् प्रत्यय होकर द्विगोर्लुगनपत्ये से लुक् हुआ तो पञ्चकपाल ही बना। अब परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः के अनुसार पर पद कपाल के अनुसार नपुंसकलिङ्ग ही होना चाहिए था किन्तु द्विगुप्राप्तापन्नालंपूर्वगतिसमासेषु प्रतिषेधो वाच्यः से इसका निषेध हुआ। अतः अपने विशेष्य पद पुरोडाशः के अनुसार पुँल्लिङ्ग हुआ। सु, रुत्वविसर्ग होकर के पञ्चकपालः सिद्ध हुआ।