त्रयोदश। त्रयोविंशतिः। त्रयस्त्रिंशत्।
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९६१- त्रेस्त्रयः। त्रेः षष्ठ्यन्तं, त्रयः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। द्व्यष्टनः सङ्ख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः से सङ्ख्यायाम् और अबहुव्रीह्यशीत्योः एवं अलुगुत्तरपदे से उत्तरपदे की अनुवृत्ति आती है।
त्रि-शब्द के स्थान पर त्रयस् आदेश होता है, संख्यावाचक शब्द उत्तरपद में रहते किन्तु यह कार्य बहुव्रीहिसमास एवं अशीति के परे रहते नहीं होता।
त्रयोदश। तेरह। त्रयश्च दश च लौकिक विग्रह और त्रि जस् दशन् जस् अलौकिक विग्रह है। चार्थे द्वन्द्वः से द्वन्द्वसमास, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर अल्प अच् वाले त्रि का पूर्वप्रयोग हुआ। दशन् इस संख्यावाचक शब्द के उत्तरपद में रहते हुए त्रेस्त्रयः से त्रि के स्थान पर त्रयस् आदेश होकर त्रयस्+दश बना। त्रयस् के सकार को रुत्व, उत्व, गुण होकर त्रयोदशन् बना। इससे बहुवचन में जस् आया और उसका षड्भ्यो
लुक् से लुक् हुआ और नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप होकर त्रयोदश सिद्ध हुआ।
त्रयोविंशतिः। तेईस। त्रयश्च विंशतिश्च लौकिक विग्रह और त्रि जस् विंशति सु अलौकिक विग्रह है। पूर्वोक्त प्रक्रिया से समास करके त्रेस्त्रयः से त्रयस् आदेश करने पर त्रयोविंशति बन जाता है। विंशत्याद्याः सदैकत्वे अर्थात् विंशति आदि शब्द एकवचन में ही प्रयुक्त होते हैं, इस नियम के अनुसार सु के योजन से त्रयोविंशतिः बन जाता है।
त्रयस्त्रिंशत्। तैतीस। त्रयश्च त्रिंशत् च लौकिक विग्रह और त्रि जस् त्रिंशत् सु अलौकिक विग्रह है। पूर्वोक्त प्रक्रिया से समास करके त्रेस्त्रयः से त्रयस् आदेश करने पर त्रयस्+त्रिंशत् बन जाता है। सकार को रुत्व करके विसर्ग हो जाता है, पुनः विसर्जनीयस्य सः से विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश होकर त्रयस्त्रिंशत् बन जाता है। विंशत्याद्याः सदैकत्वे अर्थात् विंशति आदि एकवचन में ही प्रयुक्त होते हैं, इस नियम के अनुसार सु के योजन एवं उसके हल्ड्यादिलोप करने से त्रयस्त्रिंशत् बन जाता है।