Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 960
आकारान्तादेशविधायकं विधिसूत्रम्
द्व्यष्टनः संख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः
Aṣṭādhyāyī 6.3.47
Vṛtti Varadarājācārya

आत् स्यात्। द्वौ च दश च द्वादश। अष्टाविंशतिः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९६०- द्व्यष्टनः सङ्ख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः। द्वि च अष्ट च द्व्यष्ट, तस्माद् द्व्यष्टनः। बहुव्रीहिश्च अशीतिश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वो बहुव्रीह्यशीती, तयोर्बहुव्रीह्यशीत्योः। न बहुव्रीह्यशीत्योः अबहुव्रीह्यशीत्योः। द्व्यष्टनः पञ्चम्यन्तं, सङ्ख्यायां सप्तम्यन्तम्, अबहुव्रीह्यशीत्योः सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः से आत् तथा अलुगुत्तरपदे से उत्तरपदे की अनुवृत्ति आती है।

द्वि और अष्टन् शब्दों को आकार अन्तादेश होता है सङ्ख्यावाचक शब्द उत्तरपद में हो तो, किन्तु बहुव्रीहि समास और उत्तरपद के परे होने पर यह कार्य नहीं होता।

द्वादश। बारह। द्वौ च दश च लौकिक विग्रह और द्वि औ दशन् जस् अलौकिक विग्रह है। चार्थे द्वन्द्वः से द्वन्द्वसमास, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर अल्प अच् वाले द्वि का पूर्वप्रयोग हुआ। द्वि+दशन् में द्व्यष्टनः सङ्ख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः से द्वि के इकार के स्थान पर आकार आदेश होकर द्वादशन् बना। यह बहुवचनान्त ही होता है, अतः जस् आया। ष्णान्ता षट् से द्वादशन् की षट्संज्ञा होकर षड्भ्यो लुक् से जस् का लुक् करके द्विद्वादशन् बना। न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से नकार का लोप करके द्वादश सिद्ध हुआ। इसी तरह द्वाविंशतिः, द्वात्रिंशत् आदि भी समझना चाहिए। यह द्वन्द्वसमास का उदाहरण है किन्तु आत्व को दर्शाने के लिए यहाँ पर पढ़ा गया।

अष्टाविंशतिः। अठ्ठाइस। अष्ट च विंशतिश्च लौकिक विग्रह और द्वि औ विंशति सु अलौकिक विग्रह है। चार्थे द्वन्द्वः से द्वन्द्वसमास, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर अल्प अच् वाले अष्टन् का पूर्वप्रयोग हुआ। अष्टन्+विंशति में द्व्यष्टनः सङ्ख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः से अष्टन् के नकार के स्थान पर आकार आदेश होकर सवर्णदीर्घ करने पर अष्टाविंशति बना। यह एकवचनान्त ही होता है, अतः सु आया। उसके स्थान पर रुत्वविसर्ग होने पर अष्टाविंशतिः सिद्ध हुआ।