Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 959
आकारान्तादेशविधायकं विधिसूत्रम्
आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः
Aṣṭādhyāyī 6.3.46
Vṛtti Varadarājācārya

महत आकारोऽन्तादेशः स्यात् समानाधिकरणे उत्तरपदे जातीये च परे।

महाराजः। प्रकारवचने जातीयर्। महाप्रकारो महाजातीयः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९५९- आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः। समानाधिकरणं च जातीयश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वः समानाधिकरणजातीयौ, तयोः समानाधिकरणजातीययोः। आत् प्रथमान्तं, महतः षष्ठ्यन्तं, समानाधिकरणजातीययोः सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अलुगुत्तरपदे से उत्तरपदे की अनुवृत्ति है।

समानाधिकरण( समानविभक्ति वाला ) पद उत्तर में हो या जातीयर् प्रत्यय परे हो तो महत् शब्द के अन्त्य वर्ण तकार के स्थान पर आकार अन्तादेश होता है।

महाराजः। महान् या श्रेष्ठ राजा। महान् चासौ राजा लौकिक विग्रह और महत् सु राजन् सु अलौकिक विग्रह में विशेषणं विशेष्येण बहुलम् से समास हुआ अर्थात् महत् सु+राजन् सु की समाससंज्ञा हुई, उसके बाद प्रातिपदिकसंज्ञा हुई, सुप् का लुक् हुआ, प्रथमानिर्दिष्ट महत् की उपसर्जनसंज्ञा और उसी का पूर्वप्रयोग महत् राजन् बना। आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः से महत् के तकार के स्थान पर आकार आदेश होकर मह+आ में सवर्णदीर्घ होकर महाराजन्। यह राजन् अन्त वाला समास है तो राजाहःसखिभ्यष्टच् से टच् हुआ, अनुबन्धलोप होने के बाद महाराजन् अ बना। महाराजन् में अन् की अचोऽन्त्यादि टि से टिसंज्ञा करके नस्तद्धिते से लोप हुआ तो महाराज्+अ बना। वर्णसम्मेलन हुआ- महाराज बना। सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके महाराजः सिद्ध हुआ।

महाजातीयः। महत्त्व से युक्त। यह समास का उदाहरण नहीं है अपितु जातीयर् प्रत्यय के परे होने पर आत्त्व को दर्शाने के लिए यहाँ कथन किया गया है। प्रकारवचने जातीयर् यह जातीयर् प्रत्यय करने वाला सूत्र है। महत् शब्द से जातीयर् प्रत्यय होकर महत्+जातीय बना है। आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः से तकार के स्थान पर आकार आदेश होकर सवर्णदीर्घ करके महाजातीय बना। विभक्तिकार्य के बाद महाजातीयः सिद्ध हुआ।