Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 958
टच्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
किमेत्तिङव्ययघादाम्वद्रव्यप्रकर्षे
Aṣṭādhyāyī 5.4.11
Vṛtti Varadarājācārya

एतदन्तात्तत्पुरुषाट्टच् स्यात्। परमराजः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१५८- राजाहःसखिभ्यष्टच्। राजा च अहश्च सखा च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो राजाहःसखायस्तेभ्यः। राजाहःसखिभ्यः पञ्चम्यन्तं, टच् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तत्पुरुषस्याङ्गुलेः संख्याव्ययादेः से विभक्तिविपरिणाम करके तत्पुरुषात् की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, समासान्ताः का अधिकार पीछे से आ रहा है।

राजन्, अहन् और सखि अन्त में हो, ऐसे शब्दों से समास हो जाने के बाद समास के अन्त में टच् प्रत्यय होता है।

टकार और चकार इत्संज्ञक हैं, अकार शेष रहता है।

परमराजः। उत्तम या श्रेष्ठ राजा। परमश्चासौ राजा लौकिक विग्रह और परम सु राजन् सु अलौकिक विग्रह में विशेषणं विशेष्येण बहुलम् से समास हुआ अर्थात् परम सु+राजन् सु की समाससंज्ञा हुई, उसके बाद प्रातिपदिकसंज्ञा हुई, सुप् का लुक् हुआ, प्रथमानिर्दिष्ट परम की उपसर्जनसंज्ञा और उसी का पूर्वप्रयोग परमराजन् बना। यह राजन् अन्त वाला समास है तो राजाहःसखिभ्यष्टच् से टच् हुआ, अनुबन्धलोप होने के बाद परमराजन् अ बना। परमराजन् में अन् की अचोऽन्त्यादि टि से टिसंज्ञा करके नस्तद्धिते से टिसंज्ञक अन् का लोप हुआ तो परमराज्+अ बना। वर्णसम्मेलन हुआ- परमराज बना। सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके परमराजः सिद्ध हुआ।

दूसरा उदाहरण-

योगिराजः। योगियों में श्रेष्ठ। योगिषु राजा लौकिक विग्रह और योगिन् सुप् राजन् सु अलौकिक विग्रह में सप्तमी शौण्डैः से समास हुआ अर्थात् योगिन् सुप्+राजन् सु की समाससंज्ञा हुई, उसके बाद प्रातिपदिकसंज्ञा हुई, सुप् का लुक् हुआ, प्रथमानिर्दिष्ट योगिन् की उपसर्जनसंज्ञा और उसी का पूर्वप्रयोग करके योगिन् के नकार का नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप हुआ तो योगिराजन् बना। यह राजन् अन्त वाला समास है तो राजाहःसखिभ्यष्टच् से टच् हुआ, अनुबन्धलोप होने के बाद योगिराजन् अ बना। योगिराजन् में अन् की अचोऽन्त्यादि टि से टिसंज्ञा करके नस्तद्धिते से भसंज्ञक और टिसंज्ञक अन् का लोप हुआ तो योगिराज्+अ बना। वर्णसम्मेलन हुआ- योगिराज बना। सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके योगिराजः सिद्ध हुआ।