Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 957
पुँल्लङ्गविधायकं नियमसूत्रम्
उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायाम्
Aṣṭādhyāyī 2.4.21
Vṛtti Varadarājācārya

एतदन्तौ द्वन्द्वतत्पुरुषौ पुंस्येव।

अहश्च रात्रिश्चाहोरात्रः। सर्वरात्रः। सङ्ख्यातरात्रः।

वार्तिकम्- सङ्ख्यापूर्वं रात्रं क्लीबम्। द्विरात्रम्। त्रिरात्रम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१५७- रात्राह्लाहाः पुंसि। रात्रश्च अहश्च अहश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो रात्राह्लाहाः। रात्राह्लाहाः

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प्रथमान्तं, पुंसि सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः से विभक्तिविपरिणाम करके द्वन्द्वतत्पुरुषौ की अनुवृत्ति आती है।

रात्र, अह्न और अहन् ये अन्त में हो ऐसे द्वन्द्व और तत्पुरुष समास पुँल्लिङ्ग ही हो जाता है।

अग्रिम सूत्र परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः से उत्तरपद के अनुसार ही लिङ्गविधान होने पर और स नपुंसकम् से नपुंसकलिङ्ग की प्राप्ति होने पर अपवाद रूप यह सूत्र पठित है।

अहोरात्रः। दिन-रात। अहन् च रात्रिश्च, अनयोः समाहारः लौकिक विग्रह है और अहन् सु+रात्रि सु अलौकिक विग्रह है। यहाँ चार्थे द्वन्द्वः से द्वन्द्वसमास होता है। यह प्रयोग पुँल्लिङ्ग के विधान हेतु यहाँ पर दर्शाया गया है। समास के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अहन्+रात्रि बना। रूपरात्रिरथन्तरेषु रुत्वं वाच्यम् से अहन् के नकार को रुत्व हुआ और रेफ के स्थान पर हशि च से उत्व होकर अह+उ+रात्रि बना। गुण होकर अहोरात्रि बना। अहःसर्वैकदेशसङ्ख्यातपुण्याच्च रात्रेः से समासान्त अच् प्रत्यय होकर यस्येति च से रात्रि के इकार के लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर अहोरात्र बना। अब अग्रिम सूत्र परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः से उत्तरपद का ही लिङ्गविधान होने पर स नपुंसकम् से नपुंसकलिङ्ग की प्राप्ति हो रही थी। उसको भी बाधकर रात्राह्लाहाः पुंसि से पुँल्लिङ्ग हुआ। इससे सु, रुत्व, विसर्ग करके अहोरात्रः सिद्ध हुआ।

सर्वरात्रः। सारी रात। सर्वा चासौ रात्रिः, लौकिक विग्रह है और सर्वा सु+रात्रि सु अलौकिक विग्रह है। यहाँ विशेषणं विशेष्येण बहुलम् से समास होता है। समास के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके सर्वा+रात्रि बना। सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवद्भावः से सर्वा को पुंवद्भाव होकर सर्वरात्रि बना। अहःसर्वैकदेशसङ्ख्यातपुण्याच्च रात्रेः से समासान्त अच् प्रत्यय होकर यस्येति च से रात्रि के इकार के लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर सर्वरात्र बना। अब अग्रिम सूत्र परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः से उत्तरपद का ही लिङ्गविधान होने पर उसका बाधक स नपुंसकम् से नपुंसकलिङ्ग की प्राप्ति हो रही थी। उसको भी बाधकर रात्राह्लाहाः पुंसि से पुँल्लिङ्ग हुआ। इसके सु, रुत्व, विसर्ग करके सर्वरात्रः सिद्ध हुआ।

पूर्वरात्रः। रात का पहला भाग। पूर्व रात्रेः, लौकिक विग्रह है और पूर्व सु+रात्रि ङस् अलौकिक विग्रह है। यहाँ पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे समास होता है। समास के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, पूर्व की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग करके पूर्व+रात्रि बना। अहःसर्वैकदेशसङ्ख्यातपुण्याच्च रात्रेः से समासान्त अच् प्रत्यय होकर यस्येति च से रात्रि के इकार के लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर पूर्वरात्र बना। अब अग्रिम सूत्र परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः से उत्तरपद का ही लिङ्गविधान होने पर उसका बाधक स नपुंसकम् से नपुंसकलिङ्ग की प्राप्ति हो रही थी। उसको भी बाधकर रात्राह्लाहाः पुंसि से पुँल्लिङ्ग हुआ। इसके सु, रुत्व, विसर्ग करके पूर्वरात्रः सिद्ध हुआ। इसी तरह उत्तरं रात्रेः (रात्रि का दूसरा भाग) में भी यही प्रक्रिया करके पुँल्लिङ्ग का विधान किया जाता है जिससे उत्तररात्रः बन जाता है।

सङ्ख्यातरात्रः। गिनी गई रात। सङ्ख्याता च चासौ रात्रिः लौकिक विग्रह है और सङ्ख्याता सु+रात्रि सु अलौकिक विग्रह है। यहाँ पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन से समास होता है। समास के बाद उपसर्जनसंज्ञा, पूर्वप्रयोग, प्रातिपदिकसंज्ञा,

सुप् का लुक् करके सङ्ख्याता+रात्रि बना। पुंवत् कर्मधारयजातीयदेशीयेषु से पूर्वपद में पुंवद्भाव अर्थात् पुँल्लिङ्ग का विधान होने पर टाप् वाले आकार की निवृत्ति होकर सङ्ख्यातरात्रि बना। अहःसर्वैकदेशसङ्ख्यातपुण्याच्च रात्रेः से समासान्त अच् प्रत्यय होकर यस्येति च से रात्रि के इकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर सङ्ख्यातरात्र बना। अब अग्रिम सूत्र परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः से उत्तरपद का ही लिङ्गविधान होने पर स नपुंसकम् से नपुंसकलिङ्ग की प्राप्ति हो रही थी। उसको भी बाधकर रात्राह्लाहाः पुंसि से पुँल्लिङ्ग हुआ। इसके बाद सु, रुत्व, विसर्ग करके सङ्ख्यातरात्रः सिद्ध हुआ।

सङ्ख्यापूर्वं रात्रं क्लीबम्। यह वार्तिक है। यदि रात्र शब्द से सङ्ख्यावाचक शब्द पूर्व में हो तो उक्त सूत्र के द्वारा पुँल्लिङ्ग न होकर नपुंसकलिङ्ग हो जाता है।

द्विरात्रम्। दो रातों का समूह। द्वयो रात्र्योः समाहारः लौकिक विग्रह और द्वि ओस्+रात्रि ओस् अलौकिक विग्रह में तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च से समाहार वाच्य में समास होकर विभक्ति का लुक्, समासान्त अच् प्रत्यय, भसंज्ञक इकार का लोप, वर्णसम्मेलन करके द्विरात्र बना है। रात्राह्लाहाः पुंसि से पुँल्लिङ्ग का विधान था किन्तु इस वार्तिक के द्वारा नपुंसक ही होना निश्चित हुआ। अतः सु के बाद अम् आदेश, पूर्वरूप होकर द्विरात्रम् बना। इसी तरह त्रिरात्रम् तीन रातों का समूह। तिसृणां रात्रीणां समाहारः लौकिक विग्रह और त्रि आम्+ रात्रि आम् अलौकिक विग्रह में उक्त प्रक्रिया करके त्रिरात्रम् बनता है।