उपपदं सुबन्तं समर्थेन नित्यं समस्यते। अतिङन्तश्चायं समासः।
कुम्भं करोतीति कुम्भकारः। अतिङ् किम्? मा भवान् भूत्।
माङि लुङ् इति सप्तमीनिर्देशान्माङ्पपदम्।
परिभाषा- गतिकारकोपपदानां कृद्भिः सह समासवचनं प्राक् सुबुत्पत्तेः।
व्याघ्री। अश्वक्रीती। कच्छपीत्यादि।
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१५४- उपपदमतिङ्। उपपदं प्रथमान्तम्, अतिङ् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में
सुबामन्त्रिते पराङ्गवत्स्वरे से सुप् की और नित्यं क्रीडाजीविकयोः से नित्यम् की अनुवृत्ति आती है। समर्थः, तत्पुरुषः और समासः का अधिकार है ही।
उपपदसंज्ञक सुबन्त का समर्थ सुबन्त के साथ नित्य से समास होता है।
अतिङ् यह पद तिङन्त के साथ समास को निषेध करने के लिए पठित है।
कुम्भकारः। घड़े को बनाने वाला। कुम्भं करोति लौकिक विग्रह और कुम्भ अम् कृ इस अलौकिक विग्रह में कुम्भ की उपपदमतिङ् से उपपदसंज्ञा करके कर्मण्यण् इस कृत्प्रकरण के सूत्र से अण् प्रत्यय, अनुबन्ध का लोप, वृद्धि करके कार बन गया है। उसके बाद समास का लौकिक विग्रह कुम्भस्य कारः और अलौकिक विग्रह कुम्भ ङस्+कार में उपपदमतिङ् से समास, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके कुम्भकार बना। सु, रुत्वविसर्ग करके कुम्भकारः सिद्ध हुआ। इसी तरह सूत्रं करोतीति सूत्रकारः भी बन जाता है।
अतिङ् किम्? मा भवान् भूत्। माङि लुङ् इति सप्तमीनिर्देशान्माङ्पदम्। यहाँ पर ग्रन्थकार यह समझा रहे हैं कि माङि लुङ् यह जो माङ् के योग में लुङ् लकार का विधान करने वाला सूत्र है, इसमें माङि इस सप्तम्यन्त पद को देखते हुए इसके द्वारा निर्दिष्ट माङ् की तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् से उपपदसंज्ञा होने के कारण मा भवान् भूत् इस वाक्य में मा का कहीं भूत् इस तिङन्तपद के साथ समास न हो जाय, एतदर्थ इसे अतिङन्तसमास अर्थात् तिङ् के साथ समास का निषेध करना आवश्यक है। यहाँ उच्चारण के प्रचलन की दृष्टि से मा भवान् भूत् ऐसा उदाहरण दिया गया। वस्तुतः माङ् का सम्बन्ध क्रियापद भूत् के साथ में होने से भवान् मा भूत् ऐसा प्रयोग होना चाहिए और ऐसी स्थिति में मा का भूत् के साथ समास हो सकता था। अतः उसको रोकने के लिए सूत्र में अतिङ् पढ़ा गया है।
गतिकारकोपपदानां कृद्भिः सह समासवचनं प्राक् सुबुत्पत्तेः। यह प्राचीन आचार्यों के द्वारा पठित परिभाषा है। गति, कारक और उपपद इन का कृदन्तों के साथ समास करना हो तो कृदन्तों से सुप् विभक्ति लाने से पूर्व ही अर्थात् असुबन्त अवस्था में ही समास करना चाहिए।
समास के प्रारम्भ में सह सुपा के द्वारा एक यह नियम बन गया था कि समस्यमान दोनों पद सुबन्त होंगे अर्थात् समर्थ सुबन्त का समर्थ सुबन्त के साथ समास होगा। अब यहाँ गति, कारक और उपपद इन तीन का कृदन्त के साथ समास करते समय उक्त नियम शिथिल होगा और असुबन्त कृदन्त के साथ ही समास होगा। इसका प्रयोजन आगे स्पष्ट होगा।
व्याघ्री। विशेष रूप से सूँघने वाली। विशेषेण जिघ्रति लौकिक विग्रह है। यहाँ पर पहले आ उपसर्ग पूर्वक घ्रा धातु है, उससे आतश्चोपसर्ग के द्वारा क प्रत्यय होकर आ+घ्र बना। इससे विभक्ति आने के पूर्व ही गतिकारकोपपदानां कृद्भिः सह समासवचनं प्राक् सुबुत्पत्तेः के नियम से उपपदमतिङ् से समास हो जाता है। इस तरह आघ्र बन जाता है। इसके बाद गतिसंज्ञक वि के साथ कुगतिप्रादयः से समास होकर वि+आघ्र बना। यण होकर व्याघ्र बना। अब इससे स्त्रीलिङ्ग का प्रत्यय आना है। व्याघ्र एक जाति है। अतः जातेरस्त्रीविषयादयोपधातु से जातिलक्षण डीष् करके व्याघ्री बनाकर सु, हल्ङ्यादिलोप करके व्याघ्री बन जाता है। इस तरह यहाँ पर दो समास किये गये- उपपदसमास और
गतिसमास। दोनों समास असुबन्त की स्थिति में ही हुए। यदि यह परिभाषा न होती तो- कृदन्तों से सुबुत्पत्ति के बाद समास होता तो सुप् के आने के पहले घ्न इस कृदन्त से स्त्रीप्रत्यय करना पड़ता। ऐसी स्थिति में घ्न के जातिवाचक न होने के कारण जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से जातिलक्षण ङीष् न हो पाता। फलतः अजाद्यतष्टाप् से टाप् करके व्याघ्रा ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता।
अश्वक्रीती। घोड़े के द्वारा खरीदी गई वस्तु, भूमि आदि। अश्वेन क्रीता यह लौकिक विग्रह है। क्री धातु से क्त प्रत्यय होकर क्रीत बनता है। गतिकारकोपपदानां कृद्भिः सह समासवचनं प्राक् सुबुत्पत्तेः के नियम से क्रीत शब्द से सुप् आने के पहले ही समास होता है। अतः अश्व टा+क्रीत में कर्तृकरणे कृता बहुलम् से समास हो गया। प्रातिपदिकसंज्ञा, तृतीया का लुक् आदि करके अश्वक्रीत बन गया। उससे स्त्रीत्व की विवक्षा में क्रीतात् करणपूर्वात् से ङीष् होकर अश्वक्रीती बनता है। यहाँ समास से पूर्व कृदन्त क्रीत शब्द से यदि सुप् लाते तो उससे पूर्व स्त्रीप्रत्यय अवश्य करना होता, क्योंकि लिङ्गबोधक प्रत्यय के आने के बाद ही संख्या-कारक आदि के बोधक सु आदि प्रत्यय किये जाते हैं। अतः स्त्रीत्व की विवक्षा में क्रीत शब्द से अजाद्यतष्टाप् से टाप् हो जाता, क्रीतात् करणपूर्वात् से ङीष् नहीं, क्योंकि तब अकेला ही क्रीत रहता। अकेले में किसी से पूर्व या किसी से पर यह व्यवस्था नहीं बनती। फलतः क्रीता शब्द बन जाता और अश्वेन क्रीता अश्वक्रीता ऐसा अनिष्ट प्रयोग सिद्ध होता।
कच्छपी। कच्छ से पीने वाली। कच्छेन पिबति लौकिक विग्रह है। यहाँ पर कच्छ टा+ पा( पा पाने धातु) में सुपि स्थः से क प्रत्यय होकर प बना है। प यह कृदन्त है। गतिकारकोपपदानां कृद्भिः सह समासवचनं प्राक् सुबुत्पत्तेः के नियम से प इस कृदन्त के साथ सुप् के आने के पहले ही उपपदमतिङ् से समास हो जाता है। समास के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् करके कच्छप बन जाता है। अब इससे स्त्रीलिङ्ग का प्रत्यय आना है। कच्छप एक जाति है। अतः जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से जातिलक्षण ङीष् करके कच्छपी बना। सु, हल्ङ्यादिलोप करके कच्छपी बन जाता है। यदि यह परिभाषा न होती तो- कृदन्तों से सुबुत्पत्ति के बाद समास होता और सुप् के आने के पहले प इस कृदन्त से स्त्रीप्रत्यय करना पड़ता। ऐसी स्थिति में प के जातिवाचक न होने के कारण जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से जातिलक्षण ङीष् न हो पाता। फलतः अजाद्यतष्टाप् से टाप् करके कच्छपा ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता।