Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 953
उपपदसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
तत्रोपपदं सप्तमीस्थम्
Aṣṭādhyāyī 3.1.92
Vṛtti Varadarājācārya

सप्तम्यन्ते पदे कर्मणीत्यादौ वाच्यत्वेन स्थितं यत् कुम्भादि, तद्वाचकं पदमुपपदसंज्ञं स्यात्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१५३- तत्रोपपदं सप्तमीस्थम्। तत्र सप्तम्यन्तम्, उपपदं प्रथमान्तं, सप्तमीस्थं प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अष्टाध्यायी में धातोः के बाद यह सूत्र आता है।

धातोः सूत्र के अधिकार के अन्तर्गत कर्मण्यण् आदि सूत्रों में सप्तमी विभक्ति द्वारा निर्दिष्ट कुम्भ आदि तद्वाचक पद की उपपदसंज्ञा होती है।

तात्पर्य यह है कि कर्मण्यण् आदि सूत्रों में कर्मणि आदि सप्तम्यन्त पद आते हैं। उसमें कुम्भ आदि वाच्य रूप से रहता है। पद में अर्थ वाच्य रूप से रहता है और अर्थ में पद वाचक रूप में रहता है। इस लिए उस अर्थ का वाचक पद कुम्भ आदि कुम्भ करोतीति कुम्भकारः इत्यादि उदाहरण में आते हैं। उनकी इससे उपपदसंज्ञा होती है।

उपपदसंज्ञा का प्रयोग कृदन्त, समास और तद्धित में होता है। जैसे कुम्भं करोति में कर्मण्यण् इस सूत्र के कर्मणि इस सप्तम्यन्त के द्वारा निर्दिष्ट पद है कुम्भं (द्वितीयान्त), उसकी उपपदसंज्ञा हुई।