उपसर्जनं यो गोशब्दस्त्रीप्रत्ययान्तञ्च तदन्तस्य प्रातिपदिकस्य ह्रस्वः स्यात्।
अतिमालः।
वार्तिकम्- अवादयः क्रुष्टाद्यर्थे तृतीयया। अवक्रुष्टः कोकिलया अवकोकिलः।
वार्तिकम्- पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्थ्या। परिग्लानोऽध्ययनाय पर्यध्ययनः।
वार्तिकम्- निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या। निष्क्रान्तः कौशाम्ब्या निष्कौशाम्बिः।
१५२- गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य। गौश्च स्त्री च तयोरितरेतरद्वन्द्वो गोस्त्रियौ, तयोर्गोस्त्रियोः।
गोस्त्रियोः षष्ठ्यन्तम्, उपसर्जनस्य षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य से प्रातिपदिकस्य और ह्रस्वः की अनुवृत्ति आती है।
उपसर्जनसंज्ञक गोशब्द और उपसर्जनसंज्ञक स्त्रीलिङ्ग प्रातिपदिक को ह्रस्व होता है।
स्त्री-प्रत्यय से स्त्रियाम् सूत्र के अधिकार में किये जाने वाले टाप्, डाप्, चाप्, डीष्, डीन् आदि प्रत्यय लिये जाते हैं।
अतिमालः। माला का अतिक्रमण करने वाला, सुगन्ध से माला आदि को मात दे चुका कोई पदार्थ। मालाम् अतिक्रान्तः यह लौकिक, विग्रह और माला अम् अति अलौकिक विग्रह है। अति इस प्रादि निपात का माला अम् इस सुबन्त के साथ अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके माला अति बनने के बाद प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से अति की उपसर्जनसंज्ञा होकर पूर्वप्रयोग हुआ, फिर ह्रस्व करने के लिए एकविभक्ति चापूर्वनिपाते से माला की भी उपसर्जनसंज्ञा हुई और गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य से उपसर्जन माला को ह्रस्व होकर अतिमाल बना। सु, रुत्वविसर्ग करके अतिमालः सिद्ध हुआ। इसी तरह अतिक्रान्तो मानुषम् अतिमानुषः, अतिक्रान्तः अर्थम् अत्यर्थः आदि जगहों पर इस वार्तिक से समास किया जा सकता है।
अवादयः क्रुष्टाद्यर्थे तृतीयया। यह भी वार्तिक है। क्रुष्ट (कूजित, आहूत) आदि अर्थों में वर्तमान अव आदि निपातों का तृतीयान्त सुबन्त के साथ नित्य समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है।
अवकोकिलः। कोयली से कूजित प्रदेश आदि। अवक्रुष्टः कोकिलया लौकिक विग्रह और कोकिला टा अव अलौकिक विग्रह है। यहाँ पर अव यह निपात क्रुष्ट अर्थ में विद्यमान है, अतः कोकिला टा इस सुबन्त के साथ में अवादयः क्रुष्टाद्यर्थे तृतीयया से समास हुआ। अव+कोकिला टा की प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अव कोकिला बना। प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से अव की उपसर्जनसंज्ञा होकर पूर्वप्रयोग हुआ, फिर ह्रस्व करने के लिए एकविभक्ति चापूर्वनिपाते से कोकिला की उपसर्जनसंज्ञा हुई और उसका पूर्वनिपात नहीं हुआ। गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य से उपसर्जन कोकिला को ह्रस्व होकर अवकोकिल बना। सु, रुत्वविसर्ग करके अवकोकिलः सिद्ध हुआ। इसी तरह नियुक्तो मुनिना निमुनिः, संगतम् अर्थेन समर्थम् आदि जगहों पर इस वार्तिक से समास किया जा सकता है।
पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्थ्या। यह वार्तिक है। ग्लान (खिन्न, दुःखी, थका हुआ) आदि अर्थों में वर्तमान परि आदि निपातों का चतुर्थ्यन्त सुबन्त के साथ नित्य से समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है।
पर्याध्ययनः। अध्ययन से थका हुआ, घबराया हुआ। परिग्लानः अध्ययनाय लौकिक विग्रह और अध्ययन डे परि अलौकिक विग्रह है। यहाँ पर परि यह निपात ग्लान अर्थ में विद्यमान है, अतः अध्ययन टा इस सुबन्त के साथ में पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे चतुर्थ्या से समास हुआ। प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से परि की उपसर्जनसंज्ञा, पूर्वनिपात परि+अध्ययन टा की प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके यण् करने पर पर्याध्ययन बना। सु, रुत्वविसर्ग करके पर्याध्ययनः सिद्ध हुआ।
निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या। यह भी वार्तिक है। क्रान्त (निकला हुआ, पार
किया हुआ ) आदि अर्थों में वर्तमान निर् आदि निपातों का पञ्चम्यन्त सुबन्त के साथ नित्य से समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है।
निष्कौशाम्बिः। कौशाम्बी नगरी से निकला हुआ। निष्क्रान्तः कौशाम्ब्याः लौकिक विग्रह और कौशाम्बी ङसि निर् अलौकिक विग्रह हैं। यहाँ पर निर् यह निपात क्रान्त अर्थ में विद्यमान है, अतः कौशाम्बी ङसि इस सुबन्त के साथ में निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या से समास हुआ। प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से निर् की उपसर्जनसंज्ञा, उसका पूर्वनिपात करके निर् कौशाम्बी ङसि प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके निर्+कौशाम्बी बना। कौशाम्बी की एकविभक्ति चापूर्वनिपाते से उपसर्जनसंज्ञा हुई और उसका फल गोरित्रयोरुपसर्जनस्य से उपसर्जन कौशाम्बी को ह्रस्व होकर निर्+कौशाम्बि बना। रेफ का खरवसानयोर्विसर्जनीयः से विसर्ग और उसके स्थान पर इदुदुपधस्य चाप्रत्यययः से षकार आदेश होकर निष्कौशाम्बि बना। सु, रुत्वविसर्ग करके निष्कौशाम्बिः सिद्ध हुआ।