भेदकं भेद्येन समानाधिकरणेन बहुलं प्राग्वत्।
नीलमुत्पलं नीलोत्पलम्। बहुलग्रहणात्क्वचिन्नित्यम्। कृष्णसर्पः।
क्वचिन्न- रामो जामदग्न्यः।
१४४- विशेषणं विशेष्येण बहुलम्। विशेषणं प्रथमान्तं, विशेष्येण तृतीयान्तं, बहुलं प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन से समानाधिकरणेन की अनुवृत्ति आती है। समासः, तत्पुरुषः, सुप्, सह सुपा, विभाषा आदि पदों की अनुवृत्ति और अधिकार है।
समान विभक्ति वाले भेदक=विशेषण का भेद्य=विशेष्य के साथ बहुलता से समास होता है।
नीलोत्पलम्। नील कमल। नीलम् उत्पलम् अथवा नीलं च तद् उत्पलम् लौकिक विग्रह और नील सु+उत्पल सु अलौकिक विग्रह में विशेषणं विशेष्येण बहुलम् से समास हुआ। यहाँ पर विशेषणपद है नील सु और विशेष्यपद है उत्पल सु। दोनों प्रथमान्त एकवचन हैं। इसलिए समानाधिकरण है। नील सु+उत्पल सु की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लुक्, नील+उत्पल बना। विशेषणम् इस प्रथमान्तपद से निर्दिष्ट शब्द नील है, उसकी उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग हुआ। नील+उत्पल में गुण करके नीलोत्पल बना। प्रथमा का एकवचन सु आया, नपुंसक होने के कारण अम् आदेश हुआ और पूर्वरूप करके नीलोत्पलम् सिद्ध हुआ।
इस समास के अन्य उदाहरण-
निर्मलगुणाः। निर्मल गुण। निर्मला गुणाः अथवा निर्मलाश्च ते गुणाः लौकिक विग्रह और निर्मल जस्+गुण जस् इस अलौकिक विग्रह में विशेषणं विशेष्येण बहुलम् से समास हुआ। यहाँ पर विशेषणपद है निर्मल जस् और विशेष्यपद है गुण जस्। दोनों पद
प्रथमान्त बहुवचन के हैं, अतः समानाधिकरण है। निर्मल जस्+गुण जस् की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों जस् का लुक्, निर्मल+गुण में विशेषणम् इस प्रथमान्तपद से निर्दिष्ट शब्द निर्मल है, उसकी उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग हुआ। निर्मलगुण से प्रथमा का बहुवचन जस् आया और रामाः की तरह निर्मलगुणाः बन गया। यह पुँल्लिङ्ग का उदाहरण है।
कृष्णचतुर्दशी। कृष्णपक्ष वाली चतुर्दशी। कृष्णा चतुर्दशी अथवा कृष्णा चासौ चतुर्दशी लौकिक विग्रह और कृष्णा सु+चतुर्दशी सु इस अलौकिक विग्रह में विशेषणं विशेष्येण बहुलम् से समास हुआ। यहाँ पर विशेषणपद है कृष्णा सु और विशेष्यपद है चतुर्दशी सु। दोनों पद प्रथमान्त एकवचन के हैं, अतः समानाधिकरण है। कृष्णा सु+चतुर्दशी सु की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लुक्, कृष्णा+चतुर्दशी में विशेषणम् इस प्रथमान्तपद से निर्दिष्ट शब्द कृष्णा है, उसकी उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग हुआ। स्त्रियाः पुवद्भाषितपुंस्कादनूड् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु सूत्र के द्वारा कृष्णा को पुंवद्भाषित होकर कृष्णचतुर्दशी बना। उससे प्रथमा का एकवचन सु आया और नदीशब्द की तरह कृष्णचतुर्दशी बन गया। यह स्त्रीलिङ्ग का उदाहरण है।
अखिलभूषणानि। सारे आभूषण। अखिलानि भूषणानि अथवा अखिलानि च तानि भूषणानि लौकिक विग्रह और अखिल जस्+भूषण जस् अलौकिक विग्रह में विशेषणं विशेष्येण बहुलम् से समास हुआ। यहाँ पर विशेषणपद है अखिल जस् और विशेष्यपद है भूषण जस्। दोनों पद प्रथमान्त बहुवचन के हैं, अतः समानाधिकरण है। अखिल जस्+भूषण जस् की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों जस् का लुक्, अखिल+भूषण में विशेषणम् इस प्रथमान्तपद से निर्दिष्ट शब्द अखिल है, उसकी उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग हुआ। अखिलभूषण से प्रथमा का बहुवचन जस् आया और नपुंसकलिङ्ग होने के कारण ज्ञानानि की तरह अखिलभूषणानि बन गया। यह नपुंसकलिङ्ग का उदाहरण है।
कर्मधारयसमास में सामानाधिकरण्य को दिखाने के लिए लौकिकविग्रह प्रायः दो प्रकार से किया जाता है- केवल समास किये जाने वाले पदों के द्वारा जैसे नीलम् उत्पलम् अथवा चकार लगाकर नीलं च तद् उत्पलम् और वृद्धो नरः अथवा वृद्धश्चासौ नरः आदि।
बहुलग्रहणात्ववचिन्नित्यम्। कृष्णसर्पः। विशेषणं विशेष्येण बहुलम् इस सूत्र में बहुलम् का विशेष अर्थ है। अतः कृष्णश्चासौ सर्पः में नित्य से समास किया गया है और राम सु जामदग्न्य सु में समानाधिकरण होते हुए भी बहुल का आश्रय लेकर के समास नहीं किया गया- रामो जामदग्न्यः ही रह गया। स्मरण रहे कि बहुल के चार अर्थ होते हैं- कहीं
नित्य से प्रवृत्त होना, कहीं नित्य से अप्रवृत्त होना, कहीं विकल्प से करना और कहीं कुछ भिन्न अर्थात् विचित्र सा ही कार्य करना। यहाँ पर कृष्णश्चासौ सर्पः में विकल्प से प्राप्त समास को इसने नित्य से कर दिया और रामश्चासौ जागदग्न्यः में प्राप्त होने की स्थिति है, फिर भी प्रवृत्त नहीं हुआ।