Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 945
सोपमानकर्मधारयसमासविधायकं विधिसूत्रम्
उपमानानि सामान्यवचनैः
Aṣṭādhyāyī 2.1.55
Vṛtti Varadarājācārya

घन इव श्यामो घनश्यामः।

वार्तिकम्- शाकपार्थिवादीनां सिद्धय उत्तरपदलोपस्योपसङ्ख्यानम्।

शाकप्रियः पार्थिवः शाकपार्थिवः। देवपूजको ब्राह्मणो देवब्राह्मणः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१४५- उपमानानि सामान्यवचनैः। उपमानानि प्रथमान्तं, सामान्यवचनैः तृतीयान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन से समानाधिकरणेन की अनुवृत्ति आती है, इसके अतिरिक्त समासः, तत्पुरुषः, सुप्, सह सुपा, विभाषा इत्यादि पदों की अनुवृत्ति और अधिकार है ही।

उपमानवाचक सुबन्त का समान-विभक्तिक सामान्यवचन वाले सुबन्तों के साथ समास होता है।

उपमा तीन वस्तुओं से होती है- उपमान, उपमेय और समानता। जिनके द्वारा किसी अन्य वस्तु की तुल्यता या समानता दिखाई जाती है, उनको उपमान कहते हैं और जिनके लिए तुल्यता दिखाई जाती है वे उपमेय हैं। समानता तो उपमान और उपमेय में सादृश्य रूप में विद्यमान एक धर्म है। जैसे चन्द्र इव मुखं यस्याः (चन्द्रमा की तरह सुन्दर मुख वाली) में चन्द्र उपमान है, मुख उपमेय है और दोनों में विद्यमान सुन्दरता सादृश्य अर्थात् समानता है। यही उपमा है। सामान्य का अर्थ- समानानां भावः अर्थात् दोनों में विद्यमान समानता को लिया गया है। इस सूत्र में प्रथमान्तपद उपमानानि हैं, इससे निर्दिष्ट की उपसर्जनसंज्ञा होगी।

घनश्यामः। बादल की तरह श्यामवर्ण वाला, श्रीकृष्ण। घन इव श्यामः लौकिक विग्रह और घन सु+श्याम सु अलौकिक विग्रह में उपमानानि सामान्यवचनैः से समास हुआ। यहाँ पर उपमान है घन सु और समान श्याम गुण वाला सुबन्त है श्याम सु। दोनों पद प्रथमान्त एकवचन के हैं, अतः समानाधिकरण है। घन सु+श्याम सु की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लुक्, घन+श्याम में उपमानानि इस प्रथमान्तपद से निर्दिष्ट शब्द घन है, उसकी उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग हुआ। घनश्याम से प्रथमा का एकवचन सु आया और रामः की तरह घनश्यामः बन गया।

अन्य उदाहरण-

कर्पूरगौरः। कर्पूर की तरह श्वेतवर्ण वाला। कर्पूर इव गौरः लौकिक विग्रह और कर्पूर सु+गौर सु में उपमानानि सामान्यवचनैः से समास हुआ। यहाँ पर उपमान है कर्पूर सु और समान-गुण वाला सुबन्त है गौर सु। दोनों पद प्रथमान्त एकवचन के हैं, अतः समानाधिकरण है। कर्पूर सु+गौर सु की समाससंज्ञा और प्रातिपदिकसंज्ञा करके सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लुक्, कर्पूर+गौर में उपमानानि इस प्रथमान्तपद से निर्दिष्ट शब्द कर्पूर है, उसकी उपसर्जनसंज्ञा और पूर्व का पूर्व में ही प्रयोग हुआ। कर्पूरगौर से प्रथमा का एकवचन सु आया और रामः की तरह कर्पूरगौरः बन गया।

शाकपार्थिवादीनां सिद्धये उत्तरपदलोपस्योपसङ्ख्यानम्। यह वार्तिक है। शाकप्रियः पार्थिवः आदि में उत्तरपद प्रियः का लोप करने पर ही शाकपार्थिवः बनता है। शाकपार्थिव आदि की सिद्धि के लिए उत्तरपद का लोप किया जाना चाहिए, जिससे अनेक शब्दों की सिद्धि होती है। इस वार्तिक के द्वारा किये गये कार्य को उत्तरपदलोपी समास कहते हैं। समास तो विशेषणं विशेष्येण बहुलम् से ही हो जाता है। इस वार्तिक से केवल उत्तरपदलोप किया जाता है।

शाकपार्थिवः। शाक को प्रिय मानने वाला राजा। शाकप्रियः पार्थिवः लौकिक विग्रह और शाकप्रिय सु+पार्थिव सु अलौकिक विग्रह में विशेषणं विशेष्येण बहुलम् से समास हुआ। यहाँ पर विशेषणपद है शाकप्रिय सु और विशेष्यपद है पार्थिव सु। दोनों पद प्रथमान्त बहुवचन के हैं, अतः समानाधिकरण है। शाकप्रिय सु+पार्थिव सु की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लुक्, शाकप्रिय+पार्थिव में विशेषणम् इस प्रथमान्तपद से निर्दिष्ट शब्द शाकप्रिय है, उसकी उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वपूर्वप्रयोग हुआ। शाकप्रिय में भी दो शब्दों का समास है- शाक+प्रिय। शाकः प्रियः अस्ति यस्य स शाकप्रियः ऐसा बहुव्रीहिसमास होता है। इस समास में उत्तरपद प्रिय है। उस उत्तरपद प्रिय का शाकपार्थिवादीनां सिद्धये उत्तरपदलोपस्योपसङ्ख्यानम् से लोप हो गया- शाकपार्थिव बना। प्रथमा का एकवचन सु आया और रामः की तरह शाकपार्थिवः बन गया। इसी प्रकार देवपूजको ब्राह्मणः लौकिक विग्रह और देवपूजक सु+ब्राह्मण सु अलौकिक विग्रह में समास करके उत्तरपद पूजक का लोप, सु विभक्ति, अनुबन्धलोप और रुत्वविसर्ग होने पर देवब्राह्मणः बन जाता है।