समाहारे द्विगुर्द्वन्द्वश्च नपुंसकं स्यात्।
पञ्चानां गवां समाहारः पञ्चगवम्।
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१४३- स नपुंसकम्। सः प्रथमान्तं, नपुंसकं प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्।
समाहार में द्विगु और द्वन्द्व नपुंसक होता है।
पञ्चगवम्। पाँच गायों का समूह। पञ्चानां गवां समाहारः लौकिक विग्रह और पञ्चन् आम्+गो आम् यह अलौकिक विग्रह है। समाहारवाच्य में तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च से समास हुआ। समास के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् करने पर पञ्चन् गो बना। लुप्त हुई विभक्ति को अन्तर्वर्तिनी विभक्ति मानकर पद और पद के अन्त नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप होकर पञ्चगो बना। गोरतद्धितलुकि से पञ्चगो से टच् प्रत्यय होकर अनुवन्धलोप करने पर पञ्चगो+अ बना। एचोऽयवायावः से ओकार के स्थान पर अव् आदेश होकर पञ्चगव बना। पूर्व में संख्यावाचक शब्द होने के कारण सङ्ख्यापूर्वो द्विगुः से द्विगुसंज्ञा होने के बाद स नपुंसकम् से नपुंसकलिङ्ग का कथन हुआ। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक भी है। द्विगुरेकवचनम् से एकवचन का विधान हुआ। अतः उससे एकवचन सु विभक्ति लाकर उसके स्थान पर अम् आदेश और पूर्वरूप करने पर पञ्चगवम् बन गया।