Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 939
समासान्तटज्विधायकं विधिसूत्रम्
गोरतद्धितलुकि
Aṣṭādhyāyī 5.4.92
Vṛtti Varadarājācārya

गोऽन्तात्तत्पुरुषाट्टच् स्यात् समासान्तो न तु तद्धितलुकि। पञ्चगवधनः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९३९- गोरतद्धितलुकि। तद्धितस्य लुक् तद्धितलुक्, न तद्धितलुक् अतद्धितलुक्, तस्मिन् अतद्धितलुकि। गोः पञ्चम्यन्तम्, अतद्धितलुकि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। राजाहःसखिभ्यष्टच् से टच् की और तत्पुरुषस्याङ्गुलेः सङ्ख्याव्ययादेः से वचनविपरिणाम करके तत्पुरुषात् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समासान्ताः का अधिकार आ ही रहा है।

गो-शब्द अन्त में हो ऐसे तत्पुरुष समास से परे समासान्त टच् प्रत्यय होता है यदि तद्धित का लुक् न हुआ हो तो।

पञ्चगवधनः। पाँच गाय धन है जिसका, वह व्यक्ति। पञ्च गावो धनं यस्य यह तीन पदों का लौकिक विग्रह और पञ्चन् जस्+गो जस्+धन सु यह अलौकिक विग्रह है। इस स्थिति में अनेकमन्यपदार्थे से बहुव्रीहि समास हो जाता है। उसके बाद पञ्चन् और गो में तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च से महाविभाषा के अन्तर्गत वैकल्पिक समास प्राप्त था तो द्वन्द्वतत्पुरुषयोरुत्तरपदे नित्यसमासवचनम् की सहायता से उत्तरपद धन+सु के परे रहते नित्य से समास हुआ। समास के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् करने पर पञ्चन् गो धन बना। लुप्त हुई विभक्ति को अन्तर्वर्तिनी विभक्ति मानकर पद और पद के अन्त नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप होकर पञ्चगो धन बना। गोरतद्धितलुकि

से धन उत्तरपद के परे रहते पञ्चगो से टच् प्रत्यय होकर अनुबन्धलोप करने पर पञ्चगो+अ+धन बना। एचोऽयवायावः से ओकार के स्थान पर अव् आदेश होकर पञ्चगवधन बना। यद्यपि धन-शब्द नपुंसकलिङ्गी है तथापि बहुव्रीहि समास होने पर अन्यपदार्थ(पाँच गाय रूपी धन वाला) पुरुष का विशेषण होने से वह पुँल्लिङ्ग का वाचक बन गया है। अतः यह पुँल्लिङ्ग में प्रयुक्त है। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक भी है। उससे सु विभक्ति लाकर उसके स्थान पर रुत्वविसर्ग करने पर पञ्चगवधनः सिद्ध हुआ।