जिति णिति च तद्धितेष्वचामादेरचो वृद्धिः स्यात्। यस्येति च।
पौर्वशालः। पञ्च गावो धनं यस्येति त्रिपदे बहुव्रीहौ-
वार्तिकम्- द्वन्द्वतत्पुरुषयोरुत्तरपदे नित्यसमासवचनम्।
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९३८- तद्धितेष्वचामादेः। तद्धितेषु सप्तम्यन्तम्, अचाम्, षष्ठ्यन्तम्, आदेः षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अचो जिति से अचः, जिति और मृजेर्वृद्धिः से वृद्धिः की अनुवृत्ति आती है।
जित् या णित् तद्धित प्रत्ययों के परे होने पर अचों में आदि अच् की वृद्धि होती है।
यह सूत्र तद्धितप्रकरण में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इसके साथ ही किति च भी है, जो कित् के परे वृद्धि करता है। ज प्रत्यय के तद्धित होने के कारण उसके परे वृद्धि करने के लिए समास के बीच में इस सूत्र को दिया है।
पौर्वशालः। पूर्वदिशा वाली शाला में होने वाला। पूर्वस्यां शालायां भवः लौकिक विग्रह और पूर्वा डि+शाला डि अलौकिक विग्रह में तद्धित के लिए तैयार किये गये वाक्य होने के कारण तद्धितार्थ विषय मान कर तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च से समास हुआ। दोनों पदों में समानविभक्ति डि ही है। समास के बाद पूर्वा डि शाला डि की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों प्रत्ययों का लुक् हुआ- पूर्वा+शाला बना। प्रथमानिर्दिष्ट दिशावाचक शब्द पूर्वा की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर के पूर्वा शाला बना। सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवद्भावः से समासवृत्ति को मान कर सर्वादि पूर्वा को पुंवद्भाव होकर पूर्वशाला बना। अब तद्धित प्रत्यय होने के लिए सूत्र लगा- दिक्पूर्वपदात्संज्ञायां जः। इससे ज प्रत्यय होकर अनुबन्धलोप करने पर पूर्वशाला अ बना। अकार जित् है, अतः तद्धितेष्वचामादेः से आदि में विद्यमान अच् पू के ऊकार को वृद्धि होकर पौर्वशाला अ बना। अब यस्येति च से लकारोत्तरवर्ती भसंज्ञक आकार का लोप हुआ। पौर्वशाल्+अ=पौर्वशाल बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसको रुत्वविसर्ग हुआ- पौर्वशालः।
द्वन्द्वतत्पुरुषयोरुत्तरपदे नित्यसमासवचनम्। यह वार्तिक है। पञ्चगवधनः आदि तीन पदों में पहले अनेकमन्यपदार्थे सूत्र त्रिपद-बहुव्रीहि समास होकर बाद में उसके अन्तर्गत आने वाले पहले के दो पदों का इस तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च से नित्य से समास होता है। तत्पुरुष समास महाविभाषा अर्थात् वैकल्पिक है। अतः नित्य से समास करने के लिए इस वार्तिक का अवतरण किया गया है। अर्थ- उत्तरपद के परे होने पर यदि द्वन्द्व और तत्पुरुष समास हो तो वह नित्य से हो, ऐसा कहना चाहिए।