संज्ञायामेवेति नियमार्थं सूत्रम्। पूर्वेषुकामशमी। सप्तर्षयः।
तेनेह न- उत्तरा वृक्षाः। पञ्च ब्राह्मणाः।
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९३५- दिक्सङ्ख्ये संज्ञायाम्। दिक् च सङ्ख्या च तयोरितरेतरद्वन्द्वो दिक्सङ्ख्ये। दिक्सङ्ख्ये प्रथमान्तं, संज्ञायां सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः से समानाधिकरणेन की अनुवृत्ति और समासः, सुप्, सह सुपा, तत्पुरुषः इन पदों की अनुवृत्ति और अधिकार है।
दिशावाची और संख्यावाची सुबन्त का समानाधिकरण सुबन्त के साथ समास होता है संज्ञा अर्थ गम्यमान होने पर और वह तत्पुरुष समास कहलाता है।
यह नियमार्थ सूत्र है। नियम कैसे? संज्ञा और असंज्ञा दोनों में अग्रिम सूत्र विशेषणं विशेष्येण बहुलम् से समानाधिकरण में समास होता है। उससे सप्तर्षयः आदि में भी समास सिद्ध हो सकता है तो इस सूत्र की क्या आवश्यकता है? उत्तर यह है कि सिद्धे सत्यारभ्यमाणो विधिर्नियमाय भवति। सिद्ध होने पर भी उसी कार्य के लिए पुनः किसी सूत्र से विधान करना नियम के लिए होता है। यहाँ पर भी दिक्सङ्ख्ये संज्ञायाम् सूत्र नियमार्थ ही है। नियम इस तरह का होगा- दिशा और सङ्ख्यावाची सुबन्त का यदि समानाधिकरण के साथ समास हो तो केवल संज्ञा में ही हो अन्यत्र नहीं।
दिशावाची शब्द के साथ संज्ञा का उदाहरण-
पूर्वेषुकामशमी। पूर्वेषुकामशमी नामक प्राचीन एक गाँव। पूर्वा चासौ इषुकामशमी लौकिक विग्रह और पूर्वा सु इषुकामशमी सु अलौकिक विग्रह है। दोनों में समान विभक्ति हैं। अतः समानाधिकरण है। पूर्वा यह दिशावाचक शब्द है। समास होने के बाद एक गांव के वाचक होने के कारण संज्ञा अर्थ भी है। अतः दिक्सङ्घ्ये संज्ञायाम् से समास हुआ। समासविधायक सूत्र में प्रथमान्त पद है दिक्सङ्घ्ये और उसके द्वारा निर्दिष्ट पद है पूर्वा सु, उसकी उपसर्जनसंज्ञा के बाद पूर्वनिपात करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पूर्वा+इषुकामशमी बना। गुण होकर पूर्वेषुकामशमी बना। सु, उसका हल्ड्यादिलोप करके पूर्वेषुकामशमी सिद्ध हुआ। यह एक संज्ञा है।
सप्तर्षयः। सात ऋषियों की संज्ञा। सप्त च ते ऋषयः लौकिक विग्रह और सप्तन् जस् ऋषि जस् अलौकिक विग्रह है। दोनों में समान विभक्ति हैं। अतः समानाधिकरण है। सप्त यह संख्यावाचक शब्द है। समास होने के बाद विश्वामित्र आदि सात ऋषियों के वाचक होने के कारण संज्ञा अर्थ भी है। अतः दिक्सङ्घ्ये संज्ञायाम् से समास हुआ। समासविधायक सूत्र में प्रथमान्त पद है दिक्सङ्घ्ये और उसके द्वारा निर्दिष्ट पद है सप्तन् जस्, उसकी उपसर्जनसंज्ञा होने के बाद पूर्व का पूर्वनिपात करके प्रातिपदिकसंज्ञा, मुप् का लुक् और नकार का लोप करके सप्त+ऋषि बना। गुण, रपर होकर सप्तर्षि बना। बहुवचन में जस्, जसि च से गुण होकर सप्तर्षयः सिद्ध हुआ। यह भी एक संज्ञा ही है।
संज्ञा में विधान होने के कारण उत्तरा वृक्षाः उत्तर दिशा के वृक्ष और पञ्च ब्राह्मणाः पाँच ब्राह्मण आदि में यह समास नहीं हुआ क्योंकि उत्तर दिशा के वृक्ष यह संज्ञा नहीं है और पाँच ब्राह्मण भी संज्ञा अर्थात् किसी का नाम नहीं है।