तद्धितार्थे विषये उत्तरपदे च परतः समाहारे च वाच्ये दिक्सङ्घ्ये प्राग्वत्।
पूर्वस्यां शालायां भवः, पूर्वा शाला इति समासे जाते-
वार्तिकम्- सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवद्भावः।
.....
१३६- तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च। तद्धितस्य अर्थः तद्धितार्थः, उत्तरं च तत्पदम् उत्तरपदं। तद्धितार्थश्च उत्तरपदञ्च समाहारश्च तेषां समाहारद्वन्द्वस्तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारम्, तस्मिन् तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे। तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। दिक्संख्ये संज्ञायाम् से दिक्संख्ये और पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन से समानाधिकरणेन की अनुवृत्ति आती है तथा समासः, तत्पुरुषः, सुप्, सह सुप्, विभाषा इत्यादि पदों का अधिकार है।
तद्धित-प्रत्यय के अर्थ का विषय होने पर या उत्तरपद परे होने पर अथवा समाहार अर्थात् समूह अर्थ होने पर दिशा और संख्या के वाचक समर्थ सुबन्त का समानविभक्ति वाले सुबन्त के साथ समास होता है और वह तत्पुरुष समास है।
यह सूत्र तद्धितप्रत्यय का विषय होने पर समास कर देता है तथा उत्तरपद परे होने पर पूर्व के दो पदों का समास करता है एवं समूह अर्थ में समास करता है। इस सूत्र
के द्वारा किये गये समास को तद्धितार्थं तत्पुरुष समास, उत्तरपदसमास एवं समाहारतत्पुरुषसमास कहते हैं।
पूर्वा और शाला इन दोनों स्त्रीलिंगी शब्दों में समास होने पर पुंवद्भाव करने के लिए वार्तिक का अवतरण किया गया है-
सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवद्भावः। अर्थात् सर्वनामसंज्ञक शब्दों में वृत्तिमात्र अर्थात् समास, तद्धित आदि सभी वृत्तियों के होने पर पुंवद्भाव हो जाता है। तात्पर्य यह है कि यदि दो या दो से अधिक स्त्रीलिङ्गी या नपुंसकलिङ्गी शब्दों में पूर्व में स्थित सर्वनामसंज्ञक शब्द में विद्यमान लिङ्गबोधक प्रत्यय हट कर पुँल्लिङ्ग की तरह का शब्द हो जाता है। जैसे- पूर्वा शाला में समासवृत्ति होने के बाद इस वार्तिक से पुंवद्भाव होकर पूर्व-शाला हो जाता है। ९३७- दिक्पूर्वपदादसञ्ज्ञायां जः। दिक् पूर्वपदं यस्य स दिक्पूर्वपदं, तस्माद् दिक्पूर्वपदात्। न संज्ञा असंज्ञा, तस्याम् असंज्ञायाम्। दिक्पूर्वपदात् पञ्चम्यन्तम्, असंज्ञायां सप्तम्यन्तं, जः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। शेषे से शेषे की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, प्रातिपदिकात्, तद्धिताः का पहले से ही अधिकार चल रहा है। यह तद्धित प्रकरण का सूत्र है।
दिशा-वाचक शब्द पूर्व में हो ऐसे प्रातिपदिक से भव आदि शैक्षिक अर्थों में ज प्रत्यय होता है असंज्ञा में।
ज यह तद्धित का प्रत्यय है। जकार की चुटू से इत्संज्ञा होने के बाद लोप होकर अकार ही शेष रहता है। जित् का फल तद्धितेष्वचामादेः से वृद्धि होना है। यह प्रत्यय संज्ञा में नहीं होता।