Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 934
सप्तमीतत्पुरुष-समासविधायकं विधिसूत्रम्
सप्तमी शौण्डैः
Aṣṭādhyāyī 2.1.40
Vṛtti Varadarājācārya

सप्तम्यन्तं शौण्डादिभिः प्राग्वत्।

अक्षेषु शौण्डः, अक्षशौण्ड इत्यादि।

द्वितीयातृतीयेत्यादियोगविभागादन्यत्रापि तृतीयादिविभक्तीनां प्रयोगवशात्

समासो ज्ञेयः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१३४- सप्तमी शौण्डैः। सप्तमी प्रथमान्तं, शौण्डैः तृतीयान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में भी समासः, तत्पुरुषः, सुप्, सह सुपा, विभाषा इत्यादि पदों की अनुवृत्ति और अधिकार है।

सप्तम्यन्त का शौण्ड आदि समर्थ शब्दों के साथ समास होता है।

इस सूत्र में प्रथमान्त-पद सप्तमी है। अतः उसके द्वारा निर्दिष्ट पद की उपसर्जनसंज्ञा होगी।

अक्षशौण्डः। पासाओं से खेलने में चतुर। अक्षेषु शौण्डः लौकिक विग्रह और अक्ष सुप्+शौण्ड सु अलौकिक विग्रह में सप्तमी शौण्डैः से समास हुआ। यहाँ पर सप्तम्यन्त-पद है अक्ष+सुप् और समर्थ शब्द है शौण्ड+सु। समास के बाद अक्ष सुप्+शौण्ड सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से सुप् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- अक्ष+शौण्ड बना। प्रथमानिर्दिष्ट अक्ष की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर के अक्षशौण्ड बना है। सु विभक्ति आई और उसको रुत्वविसर्ग हुआ- अक्षशौण्डः।

सप्तमीसमास के अन्य उदाहरण-

काव्यनिपुणः। काव्यशास्त्र में निपुण। काव्ये निपुणः लौकिक विग्रह और काव्य डि+निपुण सु अलौकिक विग्रह में सप्तमी शौण्डैः से समास हुआ। यहाँ पर सप्तम्यन्त पद है काव्य+डि और समर्थ शौण्डादि शब्द है निपुण सु। समास के बाद काव्य डि+निपुण सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से डि और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- काव्य+निपुण बना। प्रथमानिर्दिष्ट काव्य की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर के काव्यनिपुण बना। सु विभक्ति आई और उसको रुत्वविसर्ग हुआ- काव्यनिपुणः।

समासविधायक सूत्रों में योगविभाग की कल्पना-

शिष्टों के द्वारा प्रयोग किये गये ऐसे बहुत कुछ तत्पुरुषसमास के प्रयोग मिलते हैं जिनका समास द्वितीयाश्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः, तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन, चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः, पञ्चमी भयेन, सप्तमी शौण्डैः इन सूत्रों से सम्भव नहीं हो सकता क्योंकि इन सूत्रों में श्रित, बलि, भय आदि शब्दों के साथ ही समास का विधान किया गया है। अतः वहाँ पर सूत्रों का विभाजन करके उन विविध प्रयोगों की सिद्धि की गई है। सूत्रों में पदों के विभाजन को योगविभाग कहते हैं। जैसे द्वितीया श्रितातीतपतित-गतात्यस्तप्राप्तापन्नैः यह सूत्र द्वितीयान्त का श्रित, अतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त और आपन्न शब्दों के साथ ही समास करता है। शेष समर्थ शब्दों के साथ तो समास नहीं हो पायेगा। इसलिए इस सूत्र का योगविभाग करके दो सूत्र बनाते हैं। प्रथमसूत्र द्वितीया और

द्वितीयसूत्र श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः हो जाता है। प्रथमसूत्र द्वितीया में समासः, तत्पुरुषः, सुप्, सह सुपा, विभाषा इत्यादि पदों की अनुवृत्ति और अधिकार आ जायेंगे। इस प्रकार से द्वितीया इस सूत्र का अर्थ बनता है- द्वितीयान्त का समर्थ सुबन्त के साथ समास हो जाय। यहाँ पर द्वितीयान्त के साथ समास करने के लिए किसी शब्दविशेष की अपेक्षा नहीं रहती है। अतः अनेक जगहों पर समास हो सकेगा। यही प्रक्रिया तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन, चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः, पञ्चमी भयेन, सप्तमी शौण्डैः इन सूत्रों में भी अपनाई जायेगी और योगविभाग वाले सूत्रों का स्वरूप होगा तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी और सप्तमी, जिससे शब्दविशेष की अपेक्षा न होने के कारण अनेक जगहों पर समास की प्रक्रिया हो सकेगी। योगविभाग करके समास किये गये कुछ प्रयोगों का दिग्दर्शन मात्र करते हैं-

वेदं विद्वान् लौकिक विग्रह और वेद अम्+विद्वस् सु अलौकिक विग्रह में द्वितीया से समास करके वेदविद्वान् बनता है। (वेद को जानने वाला)। इसी प्रकार मदेन अन्धः लौकिक विग्रह और मद टा+अन्ध सु अलौकिक विग्रह में तृतीया से समास करके मदान्धः बनता है। (मद से अन्धा)। ऐसे ही धर्माय नियमः लौकिक विग्रह और धर्म डे+नियम सु अलौकिक विग्रह में चतुर्थी से समास करके धर्मनियमः बनता है। (धर्म के लिए नियम)। द्विजाद् इतरः लौकिक विग्रह और द्विज डसि+इतर सु अलौकिक विग्रह में पञ्चमी से समास करके द्विजेतरः बनता है। (ब्राह्मण से अलग)। इसी तरह भुवने विदितः लौकिक विग्रह और भुवन डि+विदित सु अलौकिक विग्रह में सप्तमी से समास करके भुवनविदितः बनता है। (संसार में प्रसिद्ध)।