Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 933
अर्धशब्देन समासार्थं विधिसूत्रम्
अर्धं नपुंसकम्
Aṣṭādhyāyī 2.2.2
Vṛtti Varadarājācārya

समांशवाच्यर्थशब्दो नित्यं क्लीबे स प्राग्वत्। अर्धं पिप्पल्या अर्धपिप्पली।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९३३- अर्धं नपुंसकम्। अर्धं प्रथमान्तं, नपुंसकं प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। पूर्वापराधरोत्तर-मेकदेशिनैकाधिकरणे से एकाधिकरणे और एकदेशिना की अनुवृत्ति आती है। समासः, सुप्, सह सुपा, विभाषा, तत्पुरुषः इन सबों का अधिकार है।

सम अंश ( ठीक आधा भाग ) का वाचक अर्ध शब्द नपुंसक है। नित्य नपुंसक यह अर्ध शब्द का एकत्व संख्या से युक्त अवयवी सुबन्त शब्दों के साथ विकल्प से समास होता है और वह समास तत्पुरुषसंज्ञक होता है।

अर्ध शब्द जब अंश भाग आदि का वाचक रहता है तो वह पुल्लिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग में प्राप्त होता है किन्तु जब समांश अर्थात् ठीक आधे भाग अर्थ में प्रयुक्त होता है तो नित्य नपुंसक लिङ्ग वाला होता है। इस सूत्र से इस नित्य नपुंसक अर्ध सुबन्त का एकत्वसंख्याविशिष्ट अवयवी सुबन्त के साथ विकल्प से तत्पुरुषसमास हो जाता है।

अर्धपिप्पली। पिपली का आधा भाग। अर्धं पिप्पल्याः लौकिक विग्रह और पिप्पली ङस् अर्ध सु अलौकिक विग्रह है। पिप्पली ङस् इस एकत्वसंख्याविशिष्ट अवयवी सुबन्त के साथ अर्ध सु का अर्ध नपुंसकम् से समास हुआ। समास विधायक इस सूत्र में प्रथमान्त पद है- अर्धम् और इसके द्वारा निर्दिष्ट पद है- अर्ध सु। अतः इसी की प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा होती है और उसका उपसर्जन पूर्वम् से पूर्वनिपात हो जाता है। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अर्धपिप्पली बना। सु प्रत्यय, उसका हल्ड्यादिलोप करके अर्धपिप्पली सिद्ध हुआ। इसी तरह आसनस्यार्थम् आसनार्थम्, शरीरस्यार्थम् शरीरार्थम्, पणस्य अर्धं पणार्थम् आदि इसके अन्य उदाहरण हैं।