अवयविना सह पूर्वादयः समस्यन्ते, एकत्वसङ्ख्याविशिष्टश्चेदवयवी।
षष्ठीसमासापवादः। पूर्वं कायस्य पूर्वकायः। अपरकायः।
एकाधिकरणे किम्? पूर्वश्छात्राणाम्।
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९३२- पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे। पूर्वञ्च परञ्च अधरञ्च उत्तरञ्च तेषां
समाहारद्वन्द्वः पूर्वापराधरोत्तरम्। एकदेशोऽस्यास्तीति एकदेशी, तेन एकदेशिना। एकं च तद्
अधिकरणम् एकाधिकरणम्, कर्मधारयः, तस्मिन्। समासः, सुप्, सह सुपा, विभाषा,
तत्पुरुषः इन सबों का अधिकार है।
यदि अवयवी एकत्व संख्या से युक्त हो तो तद्वाचक सुबन्त के साथ पूर्व,
अपर, अधर, उत्तर इन सुबन्त समर्थ शब्दों का विकल्प से समास होता है और वह
समास तत्पुरुषसंज्ञक होता है।
यह सूत्र षष्ठी का अपवाद है। यदि षष्ठी से समास होने दिया जाय तो षष्ठी
इस प्रथमान्त पद से निर्दिष्ट शब्द का पूर्वनिपात होकर अनिष्ट रूप बन सकता है, अतः इस
सूत्र का कथन किया है।
पूर्वकायः। शरीर का अगला आधा भाग। पूर्व कायस्य लौकिक विग्रह और
काय डस् पूर्व सु अलौकिक विग्रह है। पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे से समास
हुआ। समास विधायक इस सूत्र में प्रथमान्त पद है- पूर्वापराधरोत्तरम् और इसके द्वारा निर्दिष्ट पद है- पूर्व सु। अतः इसी की प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा होती है और उसका उपसर्जन पूर्वम् से पूर्वनिपात हो जाता है। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पूर्वकाय बना। स्वादिकार्य करके पूर्वकायः सिद्ध हुआ।
अपरकायः। शरीर का दूसरा आधा भाग। अपरं कायस्य लौकिक विग्रह और काय ङस् अपर सु अलौकिक विग्रह है। पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे से समास हुआ। समास विधायक इस सूत्र में प्रथमान्त पद है- पूर्वापराधरोत्तरम् और इसके द्वारा निर्दिष्ट पद है- अपर सु। अतः इसी की प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा होती है और उसका उपसर्जन पूर्वम् से पूर्वनिपात हो जाता है। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अपरकाय बना। स्वादिकार्य करके अपरकायः सिद्ध हुआ।
एकाधिकरणे किम्? पूर्वश्छात्राणाम्। इस समासविधायक सूत्र पूर्वापराधरोत्तर-मेकदेशिनैकाधिकरणे में एकत्वसंख्या से युक्त कहना आवश्यक है जिससे एकत्वसंख्या वाले अवयवी के साथ तो समास होगा किन्तु बहुत्व संख्या वाले अवयवी के साथ नहीं। जैसा कि पूर्वश्छात्राणाम् में अवयवी छात्राणाम् बहुवचन युक्त है। अतः समास नहीं हुआ। भिन्न-भिन्न पद ही रहे- पूर्वश्छात्राणाम्।