Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 931
षष्ठीतत्पुरुष-समासविधायकं विधिसूत्रम्
षष्ठी
Aṣṭādhyāyī 2.2.8
Vṛtti Varadarājācārya

सुबन्तेन प्राग्वत्। राजपुरुषः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९३१- षष्ठी। षष्ठी प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में भी समासः, तत्पुरुषः, सुप्, सह सुपा, विभाषा इत्यादि पदों की अनुवृत्ति और अधिकार है।

षष्ठ्यन्त का समर्थ सुबन्त के साथ विकल्प से समास होता है।

यह सूत्र षष्ठ्यन्त के साथ किसी शब्दविशेष की अपेक्षा नहीं करता। अतः किसी भी शब्द के साथ समास करता है। षष्ठी शब्द में ही प्रथमा है और इसके द्वारा निर्दिष्ट शब्द की उपसर्जनसंज्ञा होगी।

राजपुरुषः। राजा का आदमी, सेवक। राज्ञः पुरुषः लौकिक विग्रह और राजन् ङस्+पुरुष सु अलौकिक विग्रह में षष्ठी से समास हुआ। यहाँ पर षष्ठ्यन्त पद है राजन् ङस् और समर्थ सुबन्त है पुरुष सु। समास के बाद राजन् ङस्+पुरुष सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से ङस् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ-राजन्+पुरुष बना। राजन् ङस् में षष्ठी थी जिसका लोप हो गया था, प्रत्ययलक्षण से विभक्तित्व लाकर पदसंज्ञा करके राजन् को पद मान लिया जाता है। पद के अन्त में विद्यमान नकार का नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप करके राजन्+पुरुष बना। प्रथमानिर्दिष्ट राज की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर के राजपुरुष बना है। सु विभक्ति आई और रुत्वविसर्ग करके राजपुरुषः सिद्ध हुआ। इसके रूप रामशब्द की तरह चलते हैं।

षष्ठीसमास के और उदाहरण देखें-

आत्मज्ञानम्। आत्मा का ज्ञान। आत्मनः ज्ञानम् लौकिक विग्रह और आत्मन्

डस्+ज्ञान सु अलौकिक विग्रह में षष्ठी से समास हुआ। यहाँ पर षष्ठ्यन्त पद है आत्मन्

डस् और समर्थ सुबन्त है ज्ञान सु। समास के बाद आत्मन् डस्+पुरुष सु की

प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से डस् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का

लुक् हुआ- आत्मन्+ज्ञान बना। आत्मन् डस् में जो षष्ठी लुप्त हुई थी, उसे प्रत्ययलक्षणेन

लाकर पदसंज्ञा करके आत्मन् को पद मान लिया जाता है। पद के अन्त में विद्यमान नकार

का नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप करके आत्म+ज्ञान बना। प्रथमानिर्दिष्ट आत्म की

उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर के आत्मज्ञान बना है। सु विभक्ति आई और अम् आदेश,

पूर्वरूप करके ज्ञानम् के जैसे आत्मज्ञानम् आदि भी बना सकते हैं।

मनोविकारः। मन का विकार। मनसः विकारः लौकिक विग्रह और मनस्

डस्+विकार सु अलौकिक विग्रह में षष्ठी से समास हुआ। यहाँ पर षष्ठ्यन्त पद है मनस्

डस् और समर्थ सुबन्त है विकार सु। समास के बाद मनस् डस्+विकार सु की

प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से डस् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का

लुक् हुआ- मनस्+विकार बना। प्रथमानिर्दिष्ट मनस् की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर

के मनस् विकार बना है। मनस् के सकार का ससजुषो रुः से रु और रु के स्थान पर

हशि च से उत्व करके मन+उ+विकार= बना। मन+उ में आद्गुणः से गुण होकर

मनोविकार बना। सु विभक्ति आई और रुत्वविसर्ग करके मनोविकारः सिद्ध हुआ। इसके

रूप रामशब्द की तरह चलते हैं।

सतां सङ्गतिः लौकिक विग्रह और सत् आम्+सङ्गति सु अलौकिक विग्रह में

भी षष्ठीसमास करके सत्सङ्गतिः बनाइये।