Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 928
पञ्चमीतत्पुरुषसमासविधायकं विधिसूत्रम्
पञ्चमी भयेन
Aṣṭādhyāyī 2.1.37
Vṛtti Varadarājācārya

चोराद्भ्यं चोरभयम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२८- पञ्चमी भयेन। पञ्चमी प्रथमान्तं, भयेन तृतीयान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में भी समासः, तत्पुरुषः, सुप्, सह सुपा, विभाषा इत्यादि पदों की अनुवृत्ति है या अधिकार विद्यमान है।

पञ्चम्यन्त शब्द का भयवाचक समर्थ सुबन्त के साथ विकल्प से समास होता है।

इसमें प्रथमान्तपद पञ्चमी है। अतः उसके द्वारा निर्दिष्टपद की उपसर्जनसंज्ञा होगी।

चोरभयम्। चोर से डर। चोराद् भयम् लौकिक विग्रह और चोर डन्सि+भय सु अलौकिक विग्रह में पञ्चमी भयेन से समास हुआ। यहाँ पर पञ्चम्यन्त पद है चोर+डन्सि और समर्थ भयवाचक-शब्द है भय+सु। समास के बाद चोर डन्सि+भय सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से डन्सि और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- चोर+भय बना। प्रथमानिर्दिष्ट चोर की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर के चोरभय बना। सु विभक्ति आई और नपुंसकलिङ्ग होने के कारण ज्ञान शब्द की तरह सु के स्थान पर अम् आदेश और पूर्वरूप हो कर सिद्ध हुआ- चोरभयम्।

भाष्यकार ने पञ्चमी भयेन का योगविभाग करके पञ्चम्यन्त का किसी भी सुबन्त के साथ में समास कहा है। अतः वृकाद् भीर्वृकभीः(भेड़िये से भय)। भयाद् भीतो भयभीतः (भय से डरा हुआ)। सिंहाद् भीतिः सिंहभीतिः(शेर से डर) आदि जगहों पर भी इस प्रकार ही समास करें।