Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 927
चतुर्थीतत्पुरुषसमासविधायकं विधिसूत्रम्
चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः
Aṣṭādhyāyī 2.1.36
Vṛtti Varadarājācārya

चतुर्थ्यन्तार्थाय यत्तद्वाचिना अर्थादिभिश्च चतुर्थ्यन्तं वा प्राग्वद्।

यूपाय दारु यूपदारु।

तदर्थेन प्रकृतिविकृतिभाव एवेष्टः। तेनेह न रन्धनाय स्थाली।

वार्तिकम्- अर्थेन नित्यसमासो विशेष्यलिङ्गता चेति वक्तव्यम्।

द्विजार्थः सूपः। द्विजार्था यवागूः। द्विजार्थं पयः।

भूतबलिः। गोहितम्। गोसुखम्। गोरक्षितम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९२७- चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः। चतुर्थी प्रथमान्तं, तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः तृतीयान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में भी समासः, तत्पुरुषः, सुप्, सह सुपा, विभाषा इत्यादि पदों की अनुवृत्ति और अधिकार है।

चतुर्थ्यन्त शब्द का चतुर्थ्यन्त के लिए जो वस्तु, तद्वाचक शब्द के साथ तथा अर्थ, बलि, हित, सुख और रक्षित शब्दों के साथ विकल्प से समास होता है और उसे तत्पुरुषसमास कहते हैं।

तदर्थ का तात्पर्य यहाँ पर पूर्वपद में निर्दिष्ट। पूर्वपद चतुर्थी के प्रत्यय होने से तदन्त होकर चतुर्थ्यन्त होता है और उस चतुर्थ्यन्त के लिए जो है, तद्वाचक शब्द के साथ समास होता है। जैसे यूपाय दारु (खम्भे के लिए लकड़ी) इसमें चतुर्थ्यन्त है यूप, उसका अर्थ है खम्भा, उसके लिए जो है वह है पेड़, तद्वाचक शब्द हुआ- दारु। उसके साथ समास होगा, साथ ही अर्थ, बलि आदि शब्दों के साथ भी समास होगा। इस सूत्र में प्रथमान्त पद है- चतुर्थी, उसके द्वारा निर्दिष्ट पद की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग आदि होंगे।

यूपाय दारु। खम्भे के लिए लकड़ी। यूपाय दारु लौकिक विग्रह और यूप डे+दारु सु अलौकिक विग्रह में चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः से समास हुआ। यहाँ पर चतुर्थ्यन्त पद है यूप+डे और समर्थ चतुर्थ्यन्तार्थ शब्द है दारु सु। समास के बाद यूप डे+दारु सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से डे और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- यूप+दारु बना। प्रथमानिर्दिष्ट यूप की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर के यूपदारु बना है। सु विभक्ति आई और दारुशब्द के नपुंसक होने के कारण उसका स्वमोर्नपुंसकात् से लुक् होकर यूपदारु सिद्ध हुआ। इसके रूप मधु-शब्द की तरह बनते हैं।

इसी तरह आप गृहाय दारु- गृहदारु, कङ्कणाय सुवर्णम्- कङ्कणसुवर्णम् आदि अनेक स्थलों पर समास कर सकते हैं।

यहाँ पर विशेष बात बता रहे हैं- तदर्थेन प्रकृतिविकृतिभाव एवेष्टः। तेनेह न रन्धनाय स्थाली। अर्थात् चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः इस सूत्र में तदर्थ शब्द से प्रत्येक तदर्थ का ग्रहण अभीष्ट नहीं है अपितु प्रकृतिविकृतिभाव तदर्थ ही ग्रहण किया जाना चाहिए अर्थात् प्रकृति से विकृति को प्राप्त होने वाले तदर्थ ही लिया जाना चाहिए। जैसे कि लकड़ी रूप प्रकृति से दारु रूप विकृति। अतः रन्धनाय स्थाली अर्थात् पकाने के लिए बरतन आदि जो स्थाली रूप प्रकृति और पकाना रूप विकृति नहीं है, में तदर्थ मान कर समास नहीं किया जायेगा, जिससे रन्धनाय स्थाली यह वाक्य ही रह जाता है।

अर्थेन नित्यसमासो विशेष्यलिङ्गता चेति वक्तव्यम्। यह वार्तिक है। अर्थ शब्द के साथ नित्य समास होता है और विशेष्य के अनुसार उसका लिङ्ग भी होता है, ऐसा चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः इस सूत्र में कहना चाहिए।

चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः से अर्थ शब्द के साथ समास तो होता है, किन्तु विकल्प से। अतः नित्य समास के लिए वार्तिक का अवतरण है साथ ही परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः से पर में विद्यमान शब्द का लिङ्ग ही तत्पुरुष समास के बाद लिङ्ग होता है, यह नियम अर्थ शब्द के साथ समास होने पर नहीं होता किन्तु विशेष्य की तरह ही लिङ्ग होता है।

द्विजार्थः ( सूपः ) ब्राह्मण के लिए (दाल)। द्विजाय अयम् लौकिक विग्रह और द्विज डे+अर्थ सु (यहाँ पर के लिए इस अर्थ के लिए अर्थ-शब्द का प्रयोग किया गया है) अलौकिक विग्रह में चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः से अर्थेन नित्यसमासो विशेष्यलिङ्गता चेति वक्तव्यम् के अनुसार नित्यसमास और विशेष्यलिङ्गता का विधान हुआ। यहाँ पर चतुर्थ्यन्त पद है द्विज+डे और समर्थ अर्थ शब्द है अर्थ सु। समास के बाद द्विज डे+अर्थ सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से डे और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- द्विज+अर्थ बना। प्रथमानिर्दिष्ट द्विज की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग करके सवर्णदीर्घ करने पर द्विजार्थ बना है। सु विभक्ति आई और रुत्वविसर्ग हुआ- द्विजार्थः। यहाँ पर विशेष्य-शब्द सूपः के पुँल्लिङ्ग होने के कारण द्विजार्थः भी पुँल्लिङ्ग ही हुआ। विशेष्य के अन्य लिङ्ग में होने कारण विशेषण भी अन्यलिङ्ग अर्थात् स्त्रीलिङ्ग या नपुंसकलिङ्ग का होगा। जैसे- द्विजार्था यवागूः ब्राह्मण के लिए लप्सी(स्त्रीलिङ्ग), द्विजार्थ पयः ब्राह्मण के लिए दूध(नपुंसकलिङ्ग) आदि। पुँल्लिङ्ग में रामशब्द की तरह, स्त्रीलिङ्ग में रमाशब्द की तरह और नपुंसकलिङ्ग में ज्ञानशब्द की तरह रूप चलते हैं।

भूतबलि। भूतों के लिए बलि। भूतेभ्यो बलिः लौकिक विग्रह और भूत भ्यस्+बलि सु अलौकिक विग्रह में चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः से समास हुआ। यहाँ पर चतुर्थ्यन्त पद है भूत भ्यस् और समर्थ शब्द है बलि सु। समास के बाद भूत भ्यस्+बलि सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से भ्यस् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- भूत+बलि बना। प्रथमानिर्दिष्ट भूत की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर के भूतबलि बना। सु विभक्ति आई और अनुबन्धलोप और सकार को रुत्वविसर्ग करके भूतबलिः सिद्ध हुआ।

गोहितम्। गोओं का हित। गोभ्यो हितम् लौकिक विग्रह और गो भ्यस्+हित सु अलौकिक विग्रह में चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः से समास हुआ। यहाँ पर चतुर्थ्यन्त पद है गो भ्यस् और समर्थ हित शब्द है ही। समास के बाद गो भ्यस्+हित सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से भ्यस् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- गो+हित बना। प्रथमानिर्दिष्ट गो की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर के गोहित बना। सु विभक्ति आई और नपुंसकलिङ्ग होने के कारण ज्ञान शब्द की तरह सु के स्थान पर अम् आदेश और पूर्वरूप होकर सिद्ध हुआ- गोहितम्।

इसी तरह गोभ्यः सुखम्- गोसुखम् और गोभ्यो रक्षितम्- गोरक्षितम् आदि जगहों पर भी समास कीजिए।