Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
Show
Govind
LSK 929
पञ्चमीतत्पुरुषसमासविधायकं विधिसूत्रम्
स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन
Aṣṭādhyāyī 2.1.39
Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२९- स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन। स्तोकञ्च अन्तिकञ्च दूरञ्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः स्तोकान्तिकदूराणि, तेषामर्थाः स्तोकान्तिकदूरार्थाः। स्तोकान्तिकदूरार्थाश्च कृच्छ्रञ्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि। स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि प्रथमान्तं, क्तेन तृतीयान्तं, द्विपदं सूत्रम्। पञ्चमी भयेन से पञ्चमी की अनुवृत्ति है और समासः, तत्पुरुषः, सुप्, सह सुपा, विभाषा आदि पीछे से आ रहे हैं।

स्तोकार्थक, अन्तिकार्थक, दूरार्थक तथा कृच्छ्रशब्द पञ्चम्यन्त सुबन्तों क्तप्रत्ययान्त समर्थ सुबन्त के साथ समास होता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं।

स्तोक=अल्प, कम, अन्तिक=समीप और दूर अर्थ वाले शब्दों के साथ कृच्छ्र शब्द के साथ भी यह समास हो जाता है। द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्ययेकमभिसम्बन्ध्यते अर्थात् द्वन्द्व के अन्त में स्थित पद द्वन्द्व के सभी शब्दों के साथ में योग करता है। इसलिए दूर के बाद आये हुए अर्थ शब्द का स्तोक, अन्तिक और दूर इन तीनों के साथ जुड़ता है।