कर्तरि करणे च तृतीया कृदन्तेन बहुलं प्राग्वत्।
हरिणा त्रातो हरित्रातः। नखैर्भिन्नो नखभिन्नः।
परिभाषा- कृद्ग्रहणे गतिकारकपूर्वस्यापि ग्रहणम्। नखनिर्भिन्नः।
९२६- कर्तृकरणे कृता बहुलम्। कर्ता च करणं च तयोः समाहारद्वन्द्वः कर्तृकरणं, तस्मिन् कर्तृकरणे। कर्तृकरणे सप्तम्यन्तं, कृता तृतीयान्तं, बहुलं प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन से तृतीया की अनुवृत्ति आती है। समासः, सुप्, सह सुपा, विभाषा, तत्पुरुषः आदि की अनुवृत्ति एवं अधिकार है।
कर्ता और करण अर्थ में हुए तृतीयान्त समर्थ सुबन्त का कृदन्तप्रकृतिक सुबन्त शब्दों के साथ बहुल से समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है।
हरिणा त्रातो हरित्रातः। हरि के द्वारा रक्षित। हरिणा त्रातः लौकिक विग्रह और हरि टा+त्रात सु अलौकिक विग्रह में कर्तृकरणे कृता बहुलम् से समास हुआ। यहाँ पर कर्ता अर्थ में हुई तृतीया-विभक्तियुक्त पद है हरि+टा और समर्थ सुबन्त शब्द है त्रात+सु। समास के बाद हरि टा+त्रात सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से टा और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- हरि+त्रात बना। सूत्रार्थ करते समय प्रथमान्त पद वृत्ति में तृतीया यह है, उससे निर्दिष्ट हरि की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग करके हरित्रात बना है। सु विभक्ति और उसको रुत्व और विसर्ग करके हरित्रातः सिद्ध हुआ।
नखैर्भिन्नो नखभिन्नः। नाखूनों से चीरा गया। नखैः भिन्नः लौकिक विग्रह और नख भिस्+भिन्न सु अलौकिक विग्रह में कर्तृकरणे कृता बहुलम् से समास हुआ। यहाँ पर करण अर्थ में हुई तृतीया-विभक्तियुक्त पद है नख+भिस् और समर्थ सुबन्त शब्द है भिन्न+सु। समास के बाद नख भिस्+भिन्न सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से भिस् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- नख+भिन्न बना। प्रथमानिर्दिष्ट नखभिन्न की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग करके नखभिन्न बना है। सु विभक्ति और उसको रुत्व और विसर्ग करके नखभिन्नः सिद्ध हुआ।
कृद्ग्रहणे गतिकारकपूर्वस्यापि ग्रहणम्। कृदन्त ग्रहणस्थल में गतिपूर्वक और कारकपूर्वक कृदन्त का भी ग्रहण होता है। इस परिभाषा के बल पर गति और कारक पूर्वक
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सुबन्तों के साथ भी समास किया जा सकता है। अतः नखैः निर्भिन्नः में भी कर्तृकरणे कृता बहुलम् से समास होता है। यहाँ भिन्न इस कृदन्त के पूर्व गतिसंज्ञक निर् के लगने के बाद भी समास होने में आपत्ति नहीं है। अतः नखैः निर्भिन्नः इस लौकिक विग्रह के नख भिस्+निर्भिन्न सु इस अलौकिक विग्रह में उक्त परिभाषा के बल पर समास होकर नखनिर्भिन्नः आदि भी सिद्ध होते हैं।