तृतीयान्तं तृतीयान्तार्थकृतगुणवचनेनार्थेन च सह वा प्राग्वत्।
शङ्कुलया खण्डः शण्कुलाखण्डः। धान्येनार्थो धान्यार्थः।
तत्कृतेति किम्? अक्षणा काणः।
१२५- तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन। तृतीया प्रथमान्तं, तत्कृत लुप्ततृतीयाकम्, अर्थेन तृतीयान्तं, गुणवचनेन तृतीयान्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। समासः, सुप्, सह सुपा, विभाषा, तत्पुरुषः आदि की अनुवृत्ति एवं अधिकार है।
तृतीयान्त समर्थ सुबन्त शब्द का तृतीयान्त शब्द का जो अर्थ उसके द्वारा किये गये गुण के वाचक शब्दों के साथ और अर्थ शब्द के साथ समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है।
इससे समास होने पर भी प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, उपसर्जनसंज्ञा, उपसर्जन का पूर्व में प्रयोग, सु आदि विभक्ति के कार्य आदि होंगे। इस सूत्र में प्रथमान्तपद है- तृतीया। इसके द्वारा निर्दिष्ट पद की उपसर्जनसंज्ञा होगी।
शङ्कुलाखण्डः। सरोते से किया गया टुकड़ा। शङ्कुलया खण्डः लौकिक विग्रह और शङ्कुला टा+खण्ड सु इस अलौकिक विग्रह में तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन से समास हुआ। यहाँ पर तृतीयान्तपद है शङ्कुला+टा और तृतीयार्थ सरोता, उसके द्वारा किया गया गुण वाचक शब्द है खण्ड सु वह समर्थ सुबन्त है। समास के बाद शङ्कुला टा+खण्ड सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से टा और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- शङ्कुला+खण्ड बना। प्रथमानिर्दिष्ट शङ्कुला की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर शङ्कुलाखण्ड बना। सु विभक्ति और उसको रुत्व और विसर्ग करके शङ्कुलाखण्डः सिद्ध हुआ। यह तो तत्कृतार्थेन गुणवचनेन का उदाहरण है। अब आगे अर्थशब्देन सह का उदाहरण देखिये।
धान्यार्थः। धान्य से प्रयोजन। धान्येन अर्थः लौकिक विग्रह और धान्य टा+अर्थ सु अलौकिक विग्रह में तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन से समास हुआ। यहाँ पर तृतीयान्त पद है धान्य+टा और समर्थ सुबन्त अर्थशब्द है अर्थ+सु। समास के बाद धान्य टा+अर्थ सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से टा और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों
का लुक् हुआ- धान्य+अर्थ बना। प्रथमानिर्दिष्ट धान्य की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर सवर्णदीर्घ करके धान्यार्थ बना है। सु विभक्ति और उसको रुत्व और विसर्ग करके धान्यार्थः सिद्ध हुआ।
इसी प्रकार से विद्यया अर्थः-विद्यार्थः, पुण्येन अर्थः- पुण्यार्थः, धनेन अर्थः- धनार्थः, हिरण्येन अर्थः- हिरण्यार्थः आदि भी बनते हैं।