द्वितीयान्तं श्रितादिप्रकृतिकैः सुबन्तैः सह वा समस्यते, स च तत्पुरुषः।
कृष्णं श्रितः कृष्णश्रित इत्यादि।
श्रीधरमुखोल्लासिनी
अब तत्पुरुषसमास का आरम्भ होता है। तत्पुरुषसमास में उत्तरपद के अर्थ की प्रधानता होती है। इसमें समास करने के लिए अनेक सूत्र हैं। समास के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा और सुप् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् होता है, उसके बाद उपसर्जनसंज्ञा और उपसर्जन का पूर्वप्रयोग होता है। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है।
९२४- द्वितीया श्रितातीत-पतित-गतात्यस्त-प्राप्तापन्नैः। श्रितश्च अतीतश्च, पतितश्च गतश्च अत्यस्तश्च प्राप्तश्च आपन्नश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नास्तैः। द्वितीया प्रथमान्तं, श्रितातीत-पतित-गतात्यस्त-प्राप्तापन्नैः तृतीयान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। सुबामन्त्रिते पराङ्गवत्स्वरे से सुप् की और सह सुपा से सुपा की अनुवृत्ति आती है। पीछे से समासः और तत्पुरुषः का अधिकार तो है ही।
द्वितीयाविभक्ति से युक्त समर्थ सुबन्त का श्रित, अतीत, पतित, गत, अत्यस्त, प्राप्त और आपन्न ऐसी प्रकृति है जिन की, ऐसे समर्थ सुबन्त के साथ विकल्प से समास होता है और वह समास तत्पुरुषसंज्ञक कहलाता है।
स्मरण रहे कि समास हमेशा अलौकिक विग्रह में ही होता है। इस सूत्र में प्रथमान्तपद है द्वितीया अर्थात् रमा की तरह द्वितीया भी प्रथमा विभक्ति का रूप है। इस सूत्र में द्वितीया शब्द के द्वारा द्वितीयान्त सुबन्त शब्द का ग्रहण होगा और उसकी प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा होती है। उपसर्जनसंज्ञा के बाद प्रायः उस पद का पूर्वनिपात अर्थात् पूर्व में प्रयोग होता है। समास न होने के पक्ष में कृष्ण श्रितः ऐसा वाक्य ही रह जाता है।
विशेष स्मरणीयः- कृष्ण श्रितः (कृष्ण अम् श्रित सु) विग्रह करके समास करने पर या श्रितः कृष्णम् (श्रित सु कृष्ण अम्) विग्रह करके भी समास करने पर समास करने वाले द्वितीया श्रितातीत-पतित-गतात्यस्त-प्राप्तापन्नैः में जो प्रथमान्त द्वितीया पद है, उससे निर्दिष्ट कृष्ण अम् है। उसीका पूर्वप्रयोग करने के लिए यहाँ उपसर्जनसंज्ञा की जाती है और उसीका प्रयोग भी किया जाता है। इसी प्रकार अन्यत्र भी उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग का फल समझना चाहिए। तात्पर्य यह है कि विग्रह दोनों तरह से किये जाते हैं- कृष्ण श्रितः या श्रितः कृष्णम् इसी तरह राज्ञः पुरुषः या पुरुषो राज्ञः आदि। परन्तु समासशास्त्र (समासविधायक सूत्र) में विद्यमान जो प्रथमान्त पद, उससे निर्दिष्ट का ही पूर्वप्रयोग होता है।
समास के बाद पहले उपसर्जनसंज्ञा, पूर्वप्रयोग करके विभक्ति का लुक् अथवा पहले विभक्ति का लुक् करके उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग, इस तरह दोनों प्रकार की प्रक्रियाएँ आचार्यों ने अपनाई हैं। यहाँ व्याख्या में भी कहीं पहली प्रक्रिया और कहीं दूसरी प्रक्रिया अपनाई गई है। वैसे ज्यादातर आचार्य पहले उपसर्जनसंज्ञा, पूर्वप्रयोग करके बाद में विभक्ति का लुक् करते हैं।
कृष्णश्रितः। कृष्ण का आश्रय लिया हुआ। कृष्ण श्रितः लौकिक विग्रह और कृष्ण अम्+श्रित सु अलौकिक विग्रह में द्वितीया श्रितातीत-पतित-गतात्यस्त-प्राप्तापन्नैः से समास हुआ। यहाँ पर द्वितीयान्त पद है कृष्ण+अम् और श्रितादि-प्रकृतिक समर्थ सुबन्त है श्रित+सु। समास के बाद कृष्ण अम्+श्रित सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से अम् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- कृष्ण+श्रित बना। समासविधायक सूत्र में द्वितीया इस प्रथमान्तपद के द्वारा निर्दिष्ट शब्द कृष्ण है, उसकी प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हुई और उपसर्जन पूर्वम् से कृष्ण इस पूर्व में स्थित शब्द का पूर्व में ही प्रयोग हुआ- कृष्णश्रित बना। यदि श्रितः कृष्णम् विग्रह करके समास किया जाय तो भी पर में स्थित कृष्ण अम् का ही पूर्वप्रयोग होता है। सु विभक्ति और उसको रुत्व और विसर्ग करके कृष्णश्रितः सिद्ध हुआ। इसके रूप रामशब्द
की तरह कृष्णाश्रितः, कृष्णाश्रितौ, कृष्णाश्रिताः आदि बनते हैं। स्त्रीलिङ्ग में टापू करके कृष्णाश्रिता बनता है और रमा शब्द की तरह रूप बनते हैं। अब इसी तरह लक्ष्मीश्रितः, हरिश्रितः आदि बनाइये।
अतीत आदि शब्दों के साथ भी समास की प्रक्रिया को देखिये-
अरण्यातीतः। वन को पार किया हुआ। अरण्यम् अतीतः लौकिक विग्रह और अरण्य अम्+अतीत सु अलौकिक विग्रह में द्वितीया श्रितातीत-पतित-गतात्यस्त-प्राप्तापन्नैः से समास हुआ। यहाँ पर द्वितीयान्त पद है अरण्य+अम् और श्रितादि-प्रकृतिक समर्थ सुबन्त है अतीत+सु। समास के बाद अरण्य अम्+अतीत सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से अम् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- अरण्य+अतीत बना। प्रथमानिर्दिष्ट अरण्य की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग करके सर्वादीर्घ होकर अरण्यातीत बना उससे सु विभक्ति आई और उसको रुत्व और विसर्ग करके अरण्यातीतः सिद्ध हुआ। इसके रूप रामशब्द की तरह अरण्यातीतः, अरण्यातीतौ, अरण्यातीताः आदि बनते हैं।
कूपपतितः। कुएँ में गिरा हुआ। कूपं पतितः यह लौकिक विग्रह और कूप अम्+ पतित+सु यह अलौकिक विग्रह में द्वितीया श्रितातीत-पतित-गतात्यस्त-प्राप्तापन्नैः से समास हुआ। यहाँ पर द्वितीयान्त पद है कूप+अम् और श्रितादि-प्रकृतिक समर्थ सुबन्त है पतित+सु। समास के बाद कूप अम्+पतीत सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से अम् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- कूप+पतित बना। प्रथमानिर्दिष्ट कूप की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर कूपपतित बना और सु विभक्ति आई, उसको रुत्व और विसर्ग करके कूपपतितः सिद्ध हुआ।
ग्रामगतः। गाँव गया हुआ। ग्रामं गतः लौकिक विग्रह और ग्राम अम्+गत+सु इस अलौकिक विग्रह में द्वितीया श्रितातीत-पतित-गतात्यस्त-प्राप्तापन्नैः से समास हुआ। यहाँ पर द्वितीयान्त पद है ग्राम+अम् और श्रितादि-प्रकृतिक समर्थ सुबन्त है गत+सु। समास के बाद ग्राम अम्+गत सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से अम् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- ग्राम+गत बना। प्रथमानिर्दिष्ट ग्राम की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्व का पूर्व में ही प्रयोग कर ग्रामगत बना उसके बाद सु विभक्ति हुई और उसको रुत्व और विसर्ग करके ग्रामगतः सिद्ध हुआ।
सुखप्राप्तः। सुख को पाया हुआ। सुखं प्राप्तः यह लौकिक विग्रह और सुख+अम् प्राप्त+सु इस अलौकिक विग्रह में द्वितीया श्रितातीत-पतित-गतात्यस्त- प्राप्तापन्नैः से समास हुआ। यहाँ पर द्वितीयान्तपद है सुख+अम् और श्रितादि-प्रकृतिक समर्थ सुबन्त है प्राप्त+सु। समास के बाद सुख+अम् प्राप्त+सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से अम् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ- सुख+प्राप्त बना। प्रथमानिर्दिष्ट सुख की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग कर सुखप्राप्त बना इससे सु विभक्ति और उसको रुत्व और विसर्ग करके सुखप्राप्तः सिद्ध हुआ।
दुःखापन्नः। दुःख को प्राप्त हुआ। दुःखम् आपन्नः यह लौकिक विग्रह और दुःख+अम् आपन्न+सु इस अलौकिक विग्रह में द्वितीया श्रितातीत-पतित-गतात्यस्त- प्राप्तापन्नैः से समास हुआ। यहाँ पर द्वितीयान्तपद है दुःख+अम् और श्रितादि-प्रकृतिक समर्थ सुबन्त है आपन्न+सु। समास के बाद दुःख+अम् आपन्न+सु की प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से अम् और सु इन दो सुप्-प्रत्ययों का लुक् हुआ-
दुःख+आपन्न बना। प्रथमानिर्दिष्ट दुःख की उपसर्जनसंज्ञा और पूर्वप्रयोग करके सर्वार्थदीर्घ करने पर दुःखापन्न बना। उससे सु विभक्ति, अनुबन्धलोप एवं स् को रुत्वविसर्ग होने पर- दुःखापन्नः बना।