Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 38
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VṛttiGovind
LSK 921
विकल्पेन तटज्विधायकं विधिसूत्रम्
झयः
Aṣṭādhyāyī 5.4.111
Vṛtti Varadarājācārya

झयन्तादव्ययीभावाट्टज् वा स्यात्। उपसमिधम्, उपसमित्।

इत्यव्ययीभावप्रकरणम्॥३१॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२१- झयः। झयः पञ्चम्यन्तमेकपदं सूत्रम्। अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः से विभक्तिविपरिणाम करके अव्ययीभावात् और राजाहःसखिभ्यष्टच् से टच् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समासान्ताः का अधिकार है।

झय् प्रत्याहार वाला वर्ण अन्त में हो ऐसे अव्ययीभाव से विकल्प से तद्धितसंज्ञक टच् प्रत्यय होता है।

उपसमिधम्, उपसमित्। समिधा के पास(हवन की लकड़ी को समिधा कहते हैं)। समिधः समीपम् लौकिक विग्रह और समिध्+ङस्+उप अलौकिक विग्रह में समीप इस अर्थ में विद्यमान उप का समिध् ङस् के साथ अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्यासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व- यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद समिध्+ङस्+उप इस समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। ङस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। समिध्+उप बना। प्रथमानिर्दिष्ट उप की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक उप का पूर्वप्रयोग हुआ उप+समिध् बना। झयः से विकल्प से समासान्त टच् प्रत्यय, अनुबन्धलोप होकर उपसमिध्+अ बना। वर्ण लन होकर उपसमिध बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर उपसमिध को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ, किन्तु नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति का अलुक् हुआ और सु के स्थान पर अम् आदेश होकर पूर्वरूप करने पर उपसमिधम् बना। टच् न होने के पक्ष में उपसमिध् है।

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उससे सु के आने के बाद उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् करके धकार को जश्त्व और वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करके उपसमित्, उपसमिद् ये सिद्ध हो जाते हैं।

अव्ययीभाव समास में यह ध्यान रखना चाहिए कि किस अर्थ में किस शब्द के साथ समास हो रहा है और लौकिक विग्रह क्या है और अलौकिक विग्रह क्या है? इसके अतिरिक्त यदि शब्द अदन्त है तो सुप् का अलुक् और उसके स्थान पर अम् आदेश होगा नहीं तो नहीं होगा। पञ्चमी के स्थान पर अम् आदेश नहीं होता है और तृतीया तथा सप्तमी विभक्ति के स्थान पर अम् आदेश विकल्प से होता है। सह है तो स आदेश होता है।

परीक्षा

१. इस प्रकरण में समास करने वाला एक ही सूत्र है, उसके सभी अर्थों में समास के उदाहरण लिखकर दिखाइये। यह सम्पूर्ण ५० अंक का है।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

अव्ययीभाव समास पूर्ण हुआ।

अथ तत्पुरुषः