Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 38
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VṛttiGovind
LSK 920
विकल्पेन टज्विधायकं विधिसूत्रम्
नपुंसकादन्यतरस्याम्
Aṣṭādhyāyī 5.4.109
Vṛtti Varadarājācārya

अन्नन्तं यत् क्लीबं तदन्तादव्ययीभावाट्टज् वा स्यात्। उपचर्मम्। उपचर्म।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९२०- नपुंसकादन्यतरस्याम्। नपुंसकात् पञ्चम्यन्तम्, अन्यतरस्यां सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। अनश्च से अनः की अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः से विभक्तिविपरिणाम करके अव्ययीभावात्, की तथा राजाहःसखिभ्यष्टच् से टच् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, तद्धिताः, समासान्ताः का अधिकार है।

अन् अन्त वाला जो नपुंसक लिङ्ग, तदन्त अव्ययीभाव से विकल्प से तद्धितसंज्ञक टच् प्रत्यय होता है।

उपचर्मम्, उपचर्म। चमडे के समीप। चर्मणः समीपम् लौकिक विग्रह और चर्मन्+डस्+उप अलौकिक विग्रह में समीप इस अर्थ में विद्यमान उप का चर्मन् के साथअव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास

करने के बाद चर्मन्+ङस्+उप इस समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। ङस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। चर्मन्+उप बना। प्रथमानिर्दिष्ट उप की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक उप का पूर्वप्रयोग हुआ उप+चर्मन् बना। चर्मन् नपुंसक है, अतः नपुंसकादन्यतरस्याम् से विकल्प से समासान्त टच् प्रत्यय, अनुबन्धलोप होकर उपचर्मन्+अ बना। अ के परे होने पर उपचर्मन् की यचि भम् से भसंज्ञा हुई और उपचर्मन् में विद्यमान टि अन् का नस्तद्धिते से लोप हो गया- उपचर्म्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर उपचर्म बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर उपचर्म को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ, किन्तु नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति का अलुक् हुआ और सु के स्थान पर अम् आदेश होकर पूर्वरूप करने पर उपचर्मम् बना। टच् न होने के पक्ष में उपचर्मन् है उससे सु के आने के बाद उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् और नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप करके उपचर्म बनता है। इस तरह दो रूप बन गये।