नान्तस्य भस्य टेलोपस्तद्धिते। उपराजम्। अध्यात्मम्॥
११९- नस्तद्धिते। नः षष्ठ्यन्तं, तद्धिते सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। टेः इस सूत्र की और अल्लोपोऽनः से लोपः की अनुवृत्ति आती है। भस्य का अधिकार है।
तद्धित परे होने पर नकारान्त शब्द के भसंज्ञक टि का लोप होता है।
उपराजम्। राजा के समीप। राज्ञः समीपम् लौकिक विग्रह और राजन्+ङस्+उप अलौकिक विग्रह में समीप इस अर्थ में विद्यमान उप का राजन् ङस् के साथ अव्ययं विभक्ति-समीप- समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद राजन्+ङस्+उप इस समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। ङस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। राजन्+उप बना। प्रथमानिर्दिष्ट उप की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक उप का
पूर्वप्रयोग हुआ उप+राजन् बना। अनश्च से समासान्त टच् प्रत्यय, अनुबन्धलोप होकर उपराजन्+अ बना। अ के परे होने पर उपराजन् की यचि भम् से भसंज्ञा हुई और उपराजन् में विद्यमान टि अन् का नस्तद्धिते से लोप हो गया- उपराज्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर उपराज बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर उपराज को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ, किन्तु नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति का अलुक् हुआ और सु के स्थान पर अम् आदेश होकर पूर्वरूप करने पर उपराजम् बना।
अध्यात्मम्। आत्मा में, आत्मा के विषय में। आत्मनि लौकिक विग्रह और आत्मन्+डि+अधि अलौकिक विग्रह में विभक्ति इस अर्थ में विद्यमान उप का आत्मन् डि के साथ अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद आत्मन्+डि+अधि इस समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। डि का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। आत्मन्+अधि बना। प्रथमानिर्दिष्ट अधि की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक अधि का पूर्वप्रयोग हुआ अधि+आत्मन् बना। अधि+आत्मन् में इको यणचि से यण् होकर अध्यात्मन् बना। अनश्च से समासान्त टच् प्रत्यय, अनुबन्धलोप होकर अध्यात्मन्+अ बना। अ के परे होने पर अध्यात्मन् की यचि भम् से भसंज्ञा हुई और अध्यात्मन् में विद्यमान टि अन् का नस्तद्धिते से लोप हो गया- अध्यात्म्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर अध्यात्म बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर अध्यात्म को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ, किन्तु नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति का अलुक् हुआ और सु के स्थान पर अम् आदेश होकर पूर्वरूप करने पर अध्यात्मम् बना।