अदन्तादव्ययीभावात्सुपो न लुक्, तस्य पञ्चमीं विना अमादेशश्च स्यात्।
गाः पातीति गोपास्तस्मिन्नित्यधिगोपम्।
९१२- नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः। न अव्ययपदम्, अव्ययीभावात् पञ्चम्यन्तम्, अतः पञ्चम्यन्तम्, अम् प्रथमान्तं, तु अव्ययपदम्, अपञ्चम्याः षष्ठ्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्।
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इस सूत्र में अव्ययादाप्सुपः से सुपः और ण्यक्षत्रियार्षजितो यूनि लुगणिजोः से लुक् की अनुवृत्ति आती है।
अदन्त अव्ययीभाव से परे सुप् का लुक् नहीं होता साथ ही पञ्चमी विभक्ति को छोड़कर के अन्य विभक्तियों के स्थान पर अम् आदेश होता है।
यह सूत्र अव्ययादाप्सुपः से प्राप्त सुप् के लुक् का निषेध करता है और साथ-साथ सुप् विभक्ति के स्थान पर अम् आदेश भी करता है किन्तु पञ्चमी विभक्ति के स्थान पर नहीं करता अर्थात् पञ्चमी विभक्ति को छोड़कर शेष विभक्तियों के स्थान पर अम् आदेश करता है, फिर भी इस सूत्र से सुप् के लुक् का निषेध तो पञ्चमी में भी होता ही है। अम् यह सु आदि प्रत्यय के स्थान में होने वाला आदेश है, अतः स्थानिवद्भावेन अम् में प्रत्ययत्व आ जायेगा जिससे हलन्त्यम् से प्राप्त मकार की इत्संज्ञा का न विभक्तो तुस्माः से निषेध हो जायेगा। इसलिए पूरा अम् ही आदेश के रूप में रहेगा।
अधिगोपम्। गाः पातीति गोपाः, तस्मिन् गोपि इति, अधिगोपम्। गोपि इति लौकिकविग्रहः, गोपा डि अधि इति अलौकिकविग्रहः। गोपा डि अधि यह विभक्ति अर्थ में समास का उदाहरण है। इस प्रयोग में अधि शब्द सप्तमीविभक्ति के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। गोपा डि अधि इस अलौकिक विग्रह में समास करने के लिए सूत्र लगा- अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि- व्यृद्ध्यर्थाभावात्यासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव- पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति- साकल्यान्तवचनेषु। अव्यय का विभक्ति आदि अर्थों में समर्थ सुबन्त के साथ समास होता है। अव्यय है- अधि, इसके साथ सामर्थ्य रखने वाला समर्थ सुबन्त है- गोपा डि। इस सूत्र से गोपा डि अधि का समास हो गया अर्थात् यह पूरा समुदाय समाससंज्ञा को प्राप्त हो गया। समास करने के बाद गोपा डि अधि इस समुदाय की कृत्तिद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई, गोपा डि अधि यह पूरा समुदाय प्रातिपदिक कहलाया। इसलिए इसमें लगा डि-प्रत्यय प्रातिपदिक का अवयव बन गया। डि का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। गोपा अधि बना। अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्ध्यर्थाभावा-त्यासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्त-वचनेषु इस समासविधायक सूत्र में प्रथमान्त पद है- अव्ययम्, इस पद से निर्दिष्ट है- अधि, अतः अधि की उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक अधि का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- अधिगोपा बना। अव्ययीभावश्च से नपुंसक हुआ और ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य से अधिगोपा में पा के आकार को ह्रस्व होकर अधिगोप बना। इसकी अव्ययीभावश्च (द्वितीय सूत्र) से अव्ययसंज्ञा हुई। पहले गोपा डि अधि की प्रातिपदिकसंज्ञा की गई थी किन्तु वह सब बदल गया और अधिगोप बना है, फिर भी वह प्रातिपदिक बना हुआ है क्योंकि- एकदेशविकृतमनन्यवत् के बल से विकृति होने पर भी वह प्रातिपदिक बना रहता है। अतः अधिगोप को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और अव्ययसंज्ञक होने के कारण अधिगोप इस प्रातिपदिक से आई सु आदि विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ तो उसे निषेध करने के लिए सूत्र लगा- नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः। इस सूत्र से विभक्ति के लुक् का निषेध तो हो ही गया साथ ही सु के स्थान पर अम् आदेश भी हुआ- अधिगोप+अम् बना। अमि पूर्वः से पूर्वरूप हुआ- अधिगोपम्। इस सूत्र से पञ्चमी को छोड़कर सर्वत्र अम् आदेश होता है किन्तु सुप् लुक् का निषेध पञ्चमी में भी होता है।
इसलिए पञ्चमी को छोड़कर शेष विभक्तियों में समान रूप अर्थात् अधिगोपम् ही बनेंगे किन्तु पञ्चमी में अधिगोपात्, अधिगोपाभ्याम्, अभिगोपेभ्यः बनेंगे। तृतीया और सप्तमी विभक्ति में तृतीयासप्तम्योर्बहुलम् से विकल्प से अम् आदेश होने के कारण अधिगोपेन, अधिगोपाभ्याम्, अधिगोपेः तथा अधिगोपे, अधिगोपयोः, अधिगोपेषु ये रूप भी अधिक बनते हैं। वैकल्पिक विधान करने वाले सूत्र को भी देखिये-