Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 38
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VṛttiGovind
LSK 913
बहुलेनाम्भावविधायकं विधिसूत्रम्
तृतीयासप्तम्योर्बहुलम्
Aṣṭādhyāyī 2.4.84
Vṛtti Varadarājācārya

अदन्तादव्ययीभावातृतीयासप्तम्योर्बहुलमम्भावः स्यात्।

अधिगोपम्, अधिगोपेन, अधिगोपे वा। कृष्णस्य समीपम् उपकृष्णम्।

मद्राणां समृद्धिः- सुमद्रम्। यवनानां व्यृद्धिः- दुर्यवनम्।

मक्षिकाणामभावो निर्मीक्षिकम्। हिमस्यात्ययोऽतिहिमम्।

निद्रा सम्प्रति न युज्यत इत्यतिनिद्रम्। हरिशब्दस्य प्रकाश इतिहरि।

विष्णोः पश्चाद्- अनुविष्णु। योग्यतावीप्सापदार्थानतिवृत्तिसादृश्यानि

यथार्थाः। रूपस्य योग्यमनुरूपम्। अर्थमर्थं प्रति प्रत्यर्थम्।

शक्तिमनतिक्रम्य यथाशक्ति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

९१३- तृतीयासप्तम्योर्बहुलम्। तृतीया च सप्तमी च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वस्तृतीयासप्तम्यो, तयोः। तृतीयासप्तम्योः षष्ठ्यन्तं, बहुलं प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। नाव्ययीभावादतो- ऽम्त्वपञ्चम्याः से अव्ययीभावात्, अतः और अम् की अनुवृत्ति आती है।

अदन्त अव्ययीभाव से परे तृतीया और सप्तमी के स्थान पर बहुल से अम् आदेश होता है।

नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से नित्य से प्राप्त अम् आदेश को तृतीया और सप्तमी विभक्ति के स्थान पर विकल्प से करता है। इस कार्य के उदाहरण ऊपर बताये जा चुके हैं। अब एक बार अधिगोप के सारे रूपों को तालिका में देखते हैं-

विभक्ति

एकवचन

द्विवचन

बहुवचन

प्रथमा

अधिगोपम्

अधिगोपम्

अधिगोपम्

द्वितीया

अधिगोपम्

अधिगोपम्

अधिगोपम्

तृतीया

अधिगोपम्, अधिगोपेन

अधिगोपम्, अधिगोपाभ्याम्

अधिगोपम्, अधिगोपेः

चतुर्थी

अधिगोपम्

अधिगोपम्

अधिगोपम्

पञ्चमी

अधिगोपात्

अधिगोपाभ्याम्

अधिगोपेभ्यः

षष्ठी

अधिगोपम्

अधिगोपम्

अधिगोपम्

सप्तमी

अधिगोपम्, अधिगोपे

अधिगोपम्, अधिगोपयोः

अधिगोपम्, अधिगोपेषु

सम्बोधन

हे अधिगोपम्

हे अधिगोपम्

हे अधिगोपम्

इसी तरह मालायाम् इति-

अतिमालम्, खट्वायाम् इति-

अतिखट्वम् आदि

बनाइये।

उपकृष्णम्। कृष्ण के समीप। कृष्णस्य समीपम् यह लौकिक विग्रह और कृष्ण

इन्स् उप अलौकिक विग्रह है। समीप अर्थ में विद्यमान उप के साथ कृष्ण इन्स् उप का अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद कृष्ण इन्स् उप इस समुदाय की कृत्तिद्धितसमाश्च से प्रतिपदिकसंज्ञा हो गई। इन्स् का सुपो धातुप्रतिपदिकयोः से लुक् हुआ। कृष्ण उप बना। प्रथमानिर्दिष्ट उप की प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक उप का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- उपकृष्ण बना। एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर उपकृष्ण को प्रतिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और अव्ययप्रकरण के अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञक होने के कारण सु विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ तो नाव्ययीभावादतोऽम्बपञ्चम्याः से विभक्ति के लुक् का निषेध तो हो ही गया साथ ही सु के स्थान पर अम् आदेश भी हुआ- उपकृष्ण+अम् बना। अमि पूर्वः से पूर्वरूप हुआ- उपकृष्णम्। पञ्चमी को छोड़कर सर्वत्र अम् आदेश और तृतीया और सप्तमी विभक्ति में तृतीयासप्तम्योर्बहुलम् से विकल्प से अम् आदेश होने के कारण अम् के अभाव में उपकृष्णम्, उपकृष्णेन, उपकृष्णाभ्याम्, उपकृष्णैः। उपकृष्णे, उपकृष्णयोः, उपकृष्णेषु और अम् होने के पक्ष में सर्वत्र उपकृष्णम् ही बनता है।

उपकृष्ण की ही तरह कूपस्य समीपम्- उपकूपम्, वृक्षस्य समीपम् उपवृक्षम् आदि भी बनाइये।

सुमद्रम्। मद्रदेशवासियों की समृद्धि। मद्राणां समृद्धिः यह लौकिक विग्रह और मद्र आम् सु अलौकिक विग्रह है। यहाँ पर सु विभक्ति नहीं है अपितु प्रादि वाला सु है। समृद्धि के अर्थ में सु के साथ मद्र+आम्+सु में अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद मद्र+आम्+सु इस समुदाय की कृत्तिद्धितसमासाश्च से प्रतिपदिकसंज्ञा हो गई। आम् का सुपो धातुप्रतिपदिकयोः से लुक् हुआ। मद्र+सु बना। प्रथमानिर्दिष्ट सु की प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक सु का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- सु+मद्र बना। एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर सुमद्र को प्रतिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और अव्ययप्रकरण के अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञक होने के कारण सु विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ तो नाव्ययीभावादतोऽम्बपञ्चम्याः से विभक्ति के लुक् का निषेध तो हो ही गया साथ ही सु के स्थान पर अम् आदेश भी हुआ- सुमद्र+अम् बना। अमि पूर्वः से पूर्वरूप हुआ- सुमद्रम्। शेष रूप अधिगोप की तरह बनते हैं।

सुमद्रम् की तरह भिक्षाणां समृद्धिः- सुभिक्षम् आदि भी बनाइये।

दुर्यवनम्। यवनों की समृद्धि का अभाव। यवनानां व्युद्धिः यह लौकिक विग्रह और यवन आम् दुर् यह अलौकिक विग्रह है। वृद्धि का अभाव अर्थ में यवन+आम्+दुर् में अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद यवन+आम्+दुर् इस समुदाय की कृत्तिद्धितसमासाश्च से प्रतिपदिकसंज्ञा हो

गई। आम् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। यवन+दुर् बना। प्रथमानिर्दिष्ट दुर् की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक दुर् का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- दुर्+यवन बना। रेफ का ऊर्ध्वगमन हुआ- दुर्यवन बना। एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर दुर्यवन को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और अव्ययप्रकरण के अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञक होने के कारण सु विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ तो नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति के लुक् का निषेध तो हो ही गया साथ ही सु के स्थान पर अम् आदेश भी हुआ- दुर्यवन+अम् बना। अमि पूर्वः से पूर्वरूप हुआ- दुर्यवनम्। शेष रूप अधिगोप की तरह बनते हैं।

दुर्यवनम् की तरह शकानां व्यृद्धिः- दुःशकम् आदि भी बनाइये।

निर्मक्षिकम्। मक्खियों का अभाव। मक्षिकाणाम् अभावः यह लौकिक विग्रह और मक्षिका+आम्+निर् अलौकिक विग्रह है। वस्तु के अभाव अर्थ में निर् के साथ मक्षिका+आम् का अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्ध्यर्थाभावात्यासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद मक्षिका+आम्+निर् इस समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। आम् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। मक्षिका+निर् बना। प्रथमानिर्दिष्ट निर् की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक निर् का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- निर्+मक्षिका बना। रेफ का ऊर्ध्वगमन हुआ- निर्मक्षिका बना। एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर निर्मक्षिका को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और अव्ययीभावश्च से नपुंसकलिङ्ग हुआ और ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य से का में आकार को ह्रस्व होकर निर्मक्षिक बना। अव्ययसंज्ञक होने के कारण सु विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ तो नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति के लुक् का निषेध तो हो ही गया साथ ही सु के स्थान पर अम् आदेश भी हुआ- निर्मक्षिक+अम् बना। अमि पूर्वः से पूर्वरूप हुआ- निर्मक्षिकम्। शेष रूप अधिगोप की तरह बनते हैं।

इसी तरह मशकानाम् अभावः- निर्मशकम्, विघ्नानाम् अभावः- निर्विघ्नम् आदि भी बनाने की चेष्टा करें।

अतिहिमम्। हिम का अत्यय अर्थात् ध्वंस, नाश। हिमस्यात्ययः यह लौकिक विग्रह और हिम+ङस्+अति यह अलौकिक विग्रह है। अत्यय अर्थ में अति के साथ हिम+ङस् का अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्ध्यर्थाभावात्यासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद हिम+ङस्+अति इस समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। ङस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। हिम+अति बना। प्रथमानिर्दिष्ट अति की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक अति का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- अतिहिम बना। एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर अतिहिम को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, सु विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ तो नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति के लुक् का निषेध तो हो

ही गया साथ ही सु के स्थान पर अम् आदेश भी हुआ- अतिहिम+अम् बना। अमि पूर्वः से पूर्वरूप हुआ- अतिहिमम्। शेष रूप अधिगोप की तरह बनते हैं।

अतिहिमम् की तरह शीतस्य अत्ययः- अतिशीतम् आदि भी बना सकते हैं।

अतिनिद्रम्। निद्रा इस समय उचित नहीं है। निद्रा सम्प्रति न युज्यते यह लौकिक विग्रह और निद्रा+डस्+अति यह अलौकिक विग्रह है। असम्प्रति अर्थात् इस समय उचित नहीं इस अर्थ में अति के साथ निद्रा+डस् का अव्यय विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद निद्रा+डस्+अति इस समुदाय की कृत्तिद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। डस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। निद्रा+अति बना। प्रथमानिर्दिष्ट अति की प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जन पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक अति का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- अतिनिद्रा बना एवं अव्ययीभावश्च से नपुंसकलिङ्ग, ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य से द्रा के आकार को ह्रस्व होकर अतिनिद्र बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञक होकर एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई, उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ तो नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति के लुक् का निषेध तो हो ही गया साथ ही सु के स्थान पर अम् आदेश भी हुआ- अतिनिद्र+अम् बना। अमि पूर्वः से पूर्वरूप हुआ- अतिनिद्रम्। शेष रूप अधिगोप की तरह बनते हैं।

अतिनिद्रम् की तरह कम्बलं सम्प्रति न युज्यते- अतिकम्बलम् आदि भी जानिये।

इतिहरि। हरिनाम की प्रसिद्धि। हरिशब्दस्य प्रकाशः यह लौकिक विग्रह और हरि+डस्+इति यह अलौकिक विग्रह है। शब्दप्रादुर्भाव अर्थात् नाम की प्रसिद्धि इस अर्थ में इति के साथ हरि+डस् का अव्यय विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद हरि+डस्+इति इस समुदाय की कृत्तिद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। डस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। हरि+इति बना। प्रथमानिर्दिष्ट इति की प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जन पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक इति का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- इतिहरि बना। एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर इतिहरि को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् हुआ इतिहरि।

इतिहरि की तरह पाणिनिशब्दस्य प्रकाशः- इतिपाणिनि, ज्ञानशब्दस्य प्रकाशः- इतिज्ञानम् आदि भी आप बना सकेंगे।

अनुविष्णु। विष्णु के पीछे। विष्णोः पश्चात् यह लौकिक विग्रह और विष्णु+डस्+अनु यह अलौकिक विग्रह है। पश्चात् अर्थात् पीछे इस अर्थ में अनु के साथ विष्णु+डस् का अव्यय विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद विष्णु+डस्+अनु इस समुदाय की कृत्तिद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो

.....

गई। इस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। विष्णु+अनु बना। प्रथमानिर्दिष्ट अनु की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक अनु का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- अनुविष्णु बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर अनुविष्णु को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् हुआ अनुविष्णु।

इसी तरह अनुरथम्, अनुशिष्यम्, अनुगोपालम् आदि अनेकों प्रयोगों को भी आप बनाने का प्रयत्न करें तो कठिन नहीं लगेंगे।

योग्यतावीप्सापदार्थानतिवृत्तिसादृश्यानि यथार्थाः। अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु इस सूत्र में यथा के अर्थ में विद्यमान अव्यय के साथ समास का विधान हुआ है। यथा के चार अर्थ माने गये हैं- योग्यता, वीप्सा, पदार्थानतिवृत्ति और सादृश्य। योग्यता अर्थात् योग्य, उचित होना, वीप्सा- बारम्बार होना, पदार्थानतिवृत्ति- पद के अर्थ का उल्लंघन न करना और सादृश्य का अर्थ एक जैसा होना। यहाँ पर चारों अर्थों में समास का उदाहरण दिखाया जा रहा है।

अनुरूपम्। रूप के योग्य। रूपस्य योग्यम् यह लौकिक विग्रह और रूप+इस्+अनु यह अलौकिक विग्रह में यथा के योग्यता अर्थ में विद्यमान अनु के साथ रूप+इस् का अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद रूप+इस्+अनु इस समुदाय की कृत्तिद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। इस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। रूप+अनु बना। प्रथमानिर्दिष्ट अनु की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक अनु का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- अनुरूप बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर अनुरूप को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ तो नाव्ययीभावादतोऽम्बवपञ्चम्याः से विभक्ति के लुक् का निषेध तो ही गया साथ ही सु के स्थान पर अम् आदेश भी हुआ- अनुरूप+अम् बना। अमि पूर्वः से पूर्वरूप हुआ- अनुरूपम्। शेष अधिगोपम् की तरह बनते हैं।

इसी तरह गुणानां योग्यम्- अनुगुणम्, लेखस्य योग्यम्- अनुलेखम्, विद्यालयस्य योग्यम्- अनुविद्यालयम् आदि में भी समास करने का प्रयत्न करें।

प्रत्यर्थम्। प्रत्येक अर्थ के प्रति। अर्थमर्थं प्रति लौकिक विग्रह और अर्थ+अम्+प्रति इस अलौकिक विग्रह में अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से यथा के वीप्सा अर्थ में विद्यमान प्रति के साथ रूप+इस् का समास हो गया। समास करने के बाद अर्थ+अम्+प्रति इस समुदाय की कृत्तिद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। अम् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। अर्थ+प्रति बना। प्रथमानिर्दिष्ट प्रति की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक प्रति का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- प्रति+अर्थ बना। इको यणचि से यण्

होकर प्रत्यर्थं बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर प्रत्यर्थं को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ तो नाव्ययीभावादतोऽम्बपञ्चम्याः से विभक्ति के लुक् का निषेध तो हो ही गया साथ ही सु के स्थान पर अम् आदेश भी हुआ- प्रत्यर्थ+अम् बना। अमि पूर्वः से पूर्वरूप हुआ- प्रत्यर्थम्। शेष रूप अधिगोपम् की तरह बनते हैं।

इसी तरह छात्रं छात्रं प्रति- प्रतिछात्रम्, जनं जनं प्रति- प्रतिजनम्, गृहं गृहं प्रति- प्रतिगृहम् आदि बनाने में आप सक्षम हो सकते हैं।

यथाशक्ति। शक्ति के अनुसार अर्थात् शक्ति के उल्लंघन के बिना। शक्तिम् अनतिक्रम्य लौकिक विग्रह और शक्ति अम् यथा अलौकिक विग्रह में यथा के पदार्थानतिवृत्ति अर्थात् पद के अर्थ का उल्लंघन न करना इस अर्थ में विद्यमान यथा के साथ शक्ति+अम् का अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद शक्ति+अम्+यथा इस समुदाय की कृत्तिद्धतसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। अम् का सुपो भ्रातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। शक्ति+यथा बना। प्रथमानिर्दिष्ट यथा की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक यथा का पूर्वप्रयोग हुआ अर्थात् पर में था पूर्व में आ गया- यथाशक्ति बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर यथाशक्ति को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् हुआ- यथाशक्ति।

एवं प्रकारेण बुद्धिम् अनतिक्रम्य- यथाबुद्धि, ज्ञानम् अनतिक्रम्य- यथाज्ञानम् आदि जगहों पर समास करना चाहिए।