विभक्त्यर्थादिषु वर्तमानमव्ययं सुबन्तेन सह नित्यं समस्यते सोऽव्ययीभावः।
प्रायेणाविग्रहो नित्यसमासः, प्रायेणास्वपदविग्रहो वा।
विभक्तौ- 'हरि डि अधि' इति स्थिते-
श्रीधरमुखोल्लासिनी
अब अव्ययीभाव-समास का आरम्भ होता है। प्रायः करके इस समास में एक पद अव्ययसंज्ञक होता है और एक पद अनव्यय। उस अव्यय के साथ समास होने पर पुनः उस समस्त शब्द की भी अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा होती है अर्थात् अव्ययीभाव समास होने के बाद शब्द अव्यय बन जाता है। इस समास में पूर्वपद के अर्थ की प्रधानता होती है।
१०८- अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु। विभक्तिश्च, समीपं च समृद्धिश्च, व्यृद्धिश्च अर्थाभावश्च, अत्ययश्च, असम्प्रतिश्च, शब्दप्रादुर्भावश्च, पश्चाच्च, यथा च, आनुपूर्व्यञ्च, यौगपद्यञ्च, सादृश्यञ्च, सम्पत्तिश्च, साकल्यञ्च, अन्तवचनञ्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनानि, तेषु। अव्ययं प्रथमान्तं, विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्य-यौगपद्य-
सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में सुबामन्त्रिते पराङ्गवत्स्वरे से सुप् तथा सह सुपा से सह की अनुवृत्ति आती है। समर्थः पदविधिः परिभाषा सूत्र का अर्थ भी उपस्थित रहता है।
विभक्ति, समीप, समृद्धि( ऋद्धि का आधिक्य ), व्यृद्धि( वृद्धि का अभाव ), अर्थाभाव, अत्यय( नष्ट होना ), असम्प्रति( अब युक्त न होना ), शब्दप्रादुर्भाव( शब्द का प्रकाश या प्रसिद्धि ), पश्चात्( पीछे ), यथा( योग्यता, वीप्सा, पदार्थान्तिवृत्ति और सादृश्य ), आनुपूर्व्य( क्रमशः ), यौगपद्य( एकसाथ होना ), सादृश्य( सदृश ), सम्पत्ति, साकल्य( सम्पूर्णता ) और अन्त( समाप्ति ) अर्थों में विद्यमान अव्यय का समर्थ सुबन्त के साथ नित्य से समास होता है।