सुप् सुपा सह सह वा समस्यते। समासत्वात्प्रातिपदिकत्वेन सुपो लुक्।
परार्थाभिधानं वृत्तिः। कृत्तद्धितसमासैकशेषसनाद्यन्तथातुरूपाः पञ्च वृत्तयः।
वृत्त्यर्थावबोधकं वाक्यं विग्रहः। स च लौकिकोऽलौकिकश्चेति द्विधा।
तत्र पूर्वं भूत इति लौकिकः। पूर्व अम् भूत सु इत्यलौकिकः। भूतपूर्वः।
भूतपूर्वे चरडिति निर्देशात् पूर्वनिपातः।
वार्तिकम्- इवेन सह समासो विभक्त्यलोपश्च। वागर्थो इव वागर्थाविव।
इति केवलसमासः॥३८॥
९०६- सह सुपा। सह अव्ययपदं, सुपा तृतीयान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में सुबामन्त्रिते पराङ्गवत्स्वरे से सुप् और प्राक्कडारात्समासः से समासः की अनुवृत्ति आती है। समर्थः पदविधिः इस परिभाषासूत्र से समास के सभी सूत्रों में समास समर्थाश्रित होना चाहिए, यह नियम आता ही है।
सुबन्त का समर्थ सुबन्त के साथ समास होता है।
समास होने के बाद कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा होती है और प्रातिपदिक के अवयव सुप् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् होता है।
परार्थाभिधानं वृत्तिः। समास आदि में जब पद अपने स्वार्थ को पूर्णतया या अंशतः छोड़कर एक विशिष्ट अर्थ को कहने लग जाते हैं तो उसे आचार्यों ने वृत्ति कहा है। वृत्ति में शब्दों का अर्थ मिश्रित होकर एकाकार अर्थ का रूप धारण कर लेता है। यह वृत्ति पाँच प्रकार की है- कृदन्तवृत्ति, तद्धितवृत्ति, समासवृत्ति, एकशेषवृत्ति और सनाद्यन्तथातुवृत्ति।
वृत्त्यर्थावबोधकं वाक्यं विग्रहः। स च लौकिकोऽलौकिकश्च। वृत्ति के अर्थ का बोध कराने के लिए जो वाक्य होता है उसे विग्रह कहते हैं, वह लौकिक और अलौकिक दो प्रकार का होता है। जो लोक के लिए समझने लायक विग्रह होता है, उसे लौकिक विग्रह और जो केवल व्याकरण में सूत्रादि के प्रवृत्ति के लिए अर्थात् शास्त्रीयनिर्वाह के लिए विग्रह होता है, उसे अलौकिक विग्रह कहते हैं।
भूतपूर्वः। (जो पहले हुआ हो।) पूर्व भूतः यह लौकिक विग्रह और पूर्व अम् भूत सु यह अलौकिक विग्रह है। अलौकिक विग्रह में पूर्व के बाद अम् विभक्ति है और भूत के बाद सु विभक्ति है। लौकिक विग्रह में विभक्ति को जोड़कर प्रयोग किया गया है और अलौकिक विग्रह में विभक्ति को अलग ही रखा गया है। पूर्व अम् भूत सु इस अलौकिक विग्रह में समास करने के लिए सूत्र लगा- सह सुपा। सुबन्त का समर्थ सुबन्त के साथ विकल्प से समास होता है। सुबन्त है- पूर्व अम्, इसके साथ एकार्थाभाव सामर्थ्य रखने वाला समर्थ सुबन्त है- भूत सु। इस सूत्र से 'पूर्व अम् भूत सु' का समास हो गया अर्थात् यह पूरा समुदाय समाससंज्ञा को प्राप्त हो गया। समास करने के बाद 'पूर्व अम् भूत सु' इस समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई, 'पूर्व अम् भूत
सु' यह पूरा समुदाय प्रातिपदिक कहलाया। इसलिए इसमें लगे हुए प्रत्यय प्रातिपदिक के अवयव बन गये। अम् और सु इन दो प्रत्ययों का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। पूर्व भूत बना। भूतपूर्व चरद्। इस सूत्र में भूत का पहले प्रयोग और पूर्व का बाद में प्रयोग किया है। पाणिनि जी के इस निर्देश को मानकर हम भी भूत शब्द का पहले प्रयोग करते हैं। भूतपूर्व बना। पहले 'पूर्व अम् भूत सु' की प्रातिपदिकसंज्ञा की गई थी किन्तु वह सब बदल गया, भूतपूर्व बना, फिर भी वह प्रातिपदिक बना हुआ है, क्योंकि एक परिभाषा है- एकदेशविकृतमनन्यवत्। एक भाग में कोई विकार आ जाय तो वह कोई दूसरा नहीं बन जाता, वह ही रहता है अथात् किसी कुत्ते की पूँछ कट जाय तो वह कुत्ता ही रहता है, अन्य प्राणी नहीं कहलाता। इस परिभाषा के बल पर पहले के प्रातिपदिक में विकृति आने पर भी प्रातिपदिकत्व बना रहता है। अतः भूतपूर्व को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई, उसको रुत्व और विसर्ग हुआ- भूतपूर्वः।
इवेन सह समासो विभक्त्यलोपश्च। यह वार्तिक है। इव शब्द के साथ सुबन्त का समास होता है और विभक्ति का लोप नहीं होता।
यह सूत्र समास करने के साथ-साथ सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से प्राप्त विभक्ति के लुक् का निषेध भी करता है।
वागर्थाविव। (वाणी और अर्थ की तरह।) वागर्थों इव यह लौकिक विग्रह और वागर्थ औ इव यह अलौकिक विग्रह है। अलौकिक विग्रह में समास करने के लिए वार्तिक लगा- इवेन सह समासो विभक्त्यलोपश्च। इसके द्वारा समास होने के बाद वागर्थ औ इव की प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई और बीच में विद्यमान औ विभक्ति का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् प्राप्त हुआ तो इसी वार्तिक के द्वारा उसके अलुक् का विधान हुआ। वागर्थों इव बना। औकार के स्थान पर एचोऽयवायावः से आव् आदेश होकर वागर्थाविव बन गया।
समास की प्रक्रिया में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें-
१- समास हमेशा समर्थ अर्थात् परस्पर आकांक्षा वाले पदों में ही होता है।
२- समास में लौकिक और अलौकिक दो प्रकार के विग्रह होते हैं और अलौकिक विग्रह में ही समास करने वाला सूत्र लगता है।
३- समास करने के लिए किसी सूत्र या वार्तिक की प्रवृत्ति होती है।
४- समास करने के बाद सम्पूर्ण समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा होती है।
५- समास के बाद दो शब्दों में किस का पूर्वनिपात अर्थात् पूर्व में प्रयोग हो, यह निर्णय किया जाता है जो आगे के प्रकरणों में बताया जा रहा है जिसमें उपसर्जनसंज्ञा और उपसर्जनसंज्ञक का पूर्वनिपात आदि का समावेश है।
६- अन्त में समास के प्रातिपदिकसंज्ञक होने के कारण पुनः सु आदि प्रत्ययों की उत्पत्ति होती है किन्तु अब किये जाने वाले सु आदि प्रत्ययों का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् नहीं होगा क्योंकि ये अब प्रातिपदिक के अवयव नहीं हैं। समास के लिए बनाये गये विग्रह में समास होने के बाद प्रातिपदिकसंज्ञा होने से वे प्रातिपदिक के अवयव होते हैं।
परीक्षा
द्रष्टव्यः- प्रत्येक प्रश्न दस-दस अंक के हैं।
१- समास कितने होते हैं? उसका वर्णन कीजिए।
२- वृत्ति का क्या अर्थ है और कितने प्रकार की होती है? समझाइये।
३- विग्रह के सम्बन्ध में स्पष्टतया समझाइये।
४- समर्थः पदविधिः की व्याख्या कीजिए।
५- भूतपूर्वः इस समस्त शब्द की शुरु से सिद्धि दिखाइये।
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
केवल-समास पूर्ण हुआ।
अथ-अव्ययीभावः