पदसम्बन्धी यो विधिः स समर्थाश्रितो बोध्यः।
९०४- समर्थः पदविधिः। पदस्य विधिः पदविधिः(षष्ठीतत्पुरुषः)। समर्थः प्रथमान्तं, पदविधिः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। नियम करने के कारण यह परिभाषा सूत्र है। इसको परिभाषा मानकर के ही यह नियम बनता है कि- सम्पूर्ण पाणिनीय-अष्टाध्यायी में जहाँ कहीं भी पदों से सम्बन्धी कार्य कहा जायेगा, वह कार्य समर्थ पदों के आश्रय पर ही होगा, असमर्थ पदों के नहीं।
आकांक्षा आदि के द्वारा पदार्थों में परस्पर सम्बन्ध होने की योग्यता होना ही सामर्थ्य है। जैसे सुवर्णस्य कहने के बाद यह आकांक्षा होती है कि सुवर्ण का क्या? उत्तर में कहा जाता है- कङ्कणम्। सोने का क्या? कंगना। सोने का क्या? की आकांक्षा कंगना से पूर्ण हो जाती है। इस तरह सुवर्णस्य और कङ्कणम् ये दोनों पद परस्पर आकांक्षायुक्त हैं। इन दोनों पद में सामर्थ्य है, इसलिए इनमें पदसम्बन्धी कार्य समास आदि हो जायेंगे। भार्या सुवर्णस्य कङ्कणं राज्ञः में भार्या का सुवर्ण के साथ और कङ्कण का राज्ञः के साथ परस्पर आकांक्षा न होने से सामर्थ्य नहीं है। अतः इन दो पदों का समास नहीं होता। सामर्थ्य दो प्रकार का होता है- व्यपेक्षा और एकार्थीभाव। १. वाक्य में परस्पर अन्वय होने की योग्यता रूप जो सामर्थ्य होता है, उसे व्यपेक्षा रूप सामर्थ्य कहा जाता है और २. समास हो जाने के बाद समस्त पदों के द्वारा जो विशिष्ट अर्थ की उपस्थिति होती है, उसे एकार्थीभाव रूप सामर्थ्य कहा जाता है। इसी प्रकार कृत्, तद्धित आदि प्रत्यय सम्बन्धी कार्य भी पदकार्य हैं। अतः वे भी समर्थ पदों में ही होते हैं।