अधिकरणे सप्तमी स्यात्, चकाराद् दूरान्तिकार्थेभ्यः।
औपश्लेषिको वैषयिकोऽभिव्यापकश्चेत्याधारस्त्रिधा।
कटे आस्ते। स्थाल्यां पचति। मोक्षे इच्छास्ति। सर्वस्मिन्नात्मास्ति।
वनस्य दूरे अन्तिके वा।
इति सप्तमी।
इति विभक्त्यर्थाः॥३७॥
.....
९०३- सप्तम्यधिकरणे च। सप्तमी प्रथमान्तम्, अधिकरणे सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।
अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है तथा दूर और समीप वाचक शब्दों में सप्तमीविभक्ति होती है।
आधार के तीन भेद हैं- औपश्लेषिक, वैषयिक और अभिव्यापक।
औपश्लेषिक आधार- कटे आस्ते। स्थाल्यां पचति। यहाँ पर कट और स्थाली की अधिकरण संज्ञा होकर सप्तम्यधिकरणे च से सप्तमी विभक्ति हो जाती है।
उप=समीपे, श्लेषः संयोगादिसम्बन्ध उपश्लेषः। उपश्लेषसम्बन्धी आधार औपश्लेषिक आधार। जहाँ आधार का आधेय के साथ संयोग आदि सम्बन्ध हो वहाँ औपश्लेषिक आधार होता है। जैसे- कटे आस्ते। चटाई पर है। यहाँ पर कट का बैठने वाले के साथ संयोगसम्बन्ध है, अतः कटे आस्ते में औपश्लेषिक-आधार है। इसी प्रकार स्थाल्यां पचति में भी समझना चाहिए।
वैषयिक आधार- मोक्षे इच्छास्ति। व्याकरणे रुचिः।
विषय का अर्थात् विषयता-सम्बन्ध से आधार। यह आधार बुद्धिस्थ होता है। जैसे- मोक्षे इच्छास्ति। मोक्ष के विषय में इच्छा है। यहाँ पर मोक्ष इच्छा का विषय है। इसी प्रकार शास्त्रे रुचिः, नारायणे भक्तिः आदि में भी समझना चाहिए।
अभिव्यापक आधार- सर्वस्मिन्नात्मास्ति।
जहाँ आधार के प्रत्येक स्थल पर आधेय की स्थिति हो वहाँ अभिव्यापक आधार समझना चाहिए। जैसे- सर्वस्मिन् आत्मा अस्ति। आत्मा सर्वत्र, सभी में है अर्थात् ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ आत्मा नहीं हो। यहाँ पर व्यापकता अर्थात् अभिव्यापक है।
.....
इसलिए अभिव्यापक सम्बन्ध को लेकर सप्तमीविभक्ति हुई- सर्वस्मिन्नात्मास्ति। इसी प्रकार तिलेषु तैलम्, दुग्धे घृतम् आदि भी समझना चाहिए।
वनस्य दूरे। ग्रामस्य समीपे। सप्तम्यधिकरणे च इस सूत्र में चकार के पढ़ने से यह अर्थ निकाला गया है कि इस सूत्र के पहले दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च से जिन शब्दों से द्वितीया का विधान किया गया, उन्हीं शब्दों से सप्तमी भी हो। ऐसे दूर और अन्तिक वाचक दूर और समीप शब्दों से सप्तमी विभक्ति हुई- वनस्य दूरे। ग्रामस्य समीपे।
कारकप्रकरण भाषाविज्ञान की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। पाणिनीय अष्टाध्यायी में अथवा वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में इस प्रकरण को लगभग सवा सौ सूत्रों और वार्तिकों से पूर्ण किया गया है। ऐसे विशाल प्रकरण को यहाँ कुछ ही सूत्रों से ही बताया गया है। अतः यहाँ पर अत्यन्त संक्षिप्त कथन ही हो पाया है। इसलिए यह केवल दिग्दर्शनमात्र है।
अष्टाध्यायी का पारायण आप निरन्तर कर ही रहे होंगे। उसके प्रथम अध्याय में कर्म, करण आदि संज्ञा करने वाले सारे सूत्र आ जाते हैं तथा दूसरे अध्याय में विभक्ति के विधान के लिए सूत्र हैं। अतः इस प्रकरण को समझने के बाद अन्य सूत्र याद हों तो अलग से भी समझा जा सकता है।
अब इस प्रकरण के बाद समास प्रकरण में प्रवेश करना है। हमारी लघुसिद्धान्तकौमुदी की यात्रा धीरे-धीरे पूर्णता की ओर है। सबसे पहले संज्ञाप्रकरण, उसके बाद सन्धिप्रकरण, उसके बाद षड्लिङ्गप्रकरण, उसके बाद धातुप्रकरण, उसके बाद कृदन्तप्रकरण और उसके बाद कारकप्रकरण तक के पड़ाव हमने पूरे किये। अब इसके बाद समासप्रकरण और तद्धितप्रकरण दो पड़ाव बीच में आयेंगे। उसके बाद स्त्रीप्रत्यय अन्तिम पड़ाव है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि नवीन पड़ाव में पहुँचने पर पुरानी बातें विस्मृत सी हो जाती हैं। कहीं ऐसा यहाँ पर भी न हुआ हो! एतदर्थ आप प्रतिदिन पुराने प्रकरणों को भी देखते रहें।
परीक्षा
द्रष्टव्यः- प्रत्येक प्रश्न पाँच-पाँच अंक के हैं और अनिवार्य भी हैं।
१- प्रथमाविभक्ति के किन्हीं पाँच शब्दों की सिद्धि दिखाइये
५
२- द्वितीयाविभक्ति के किन्हीं पाँच शब्दों की सिद्धि दिखाइये
५
३- तृतीयाविभक्ति के किन्हीं पाँच शब्दों की सिद्धि दिखाइये
५
४- चतुर्थीविभक्ति के किन्हीं पाँच शब्दों की सिद्धि दिखाइये
५
५- पञ्चमीविभक्ति के किन्हीं पाँच शब्दों की सिद्धि दिखाइये
५
६- षष्ठीविभक्ति के किन्हीं पाँच शब्दों की सिद्धि दिखाइये
५
७- सप्तमीविभक्ति के किन्हीं पाँच शब्दों की सिद्धि दिखाइये
५
८- षष्ठी विभक्ति को कारक क्यों नहीं माना जाता और प्रातिपदिक से आप क्या समझते हैं?
५
९- उपपदविभक्ति क्या है? दो उदाहरण सहित बताइये।
५
१०- कारकप्रकरण पर एक पेज का एक लेख लिखिए।
५
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का विभक्त्यर्थ (कारक) प्रकरण पूर्ण हुआ।३७॥
अथ समासाः
तत्रादौ केवल-समासः
समासः पञ्चधा। तत्र समसनं समासः।
स च विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्तः केवलसमासः प्रथमः॥१॥
प्रायेण पूर्वपदार्थप्रधानोऽव्ययीभावो द्वितीयः॥२॥
प्रायेणोत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषस्तृतीयः।
तत्पुरुषभेदः कर्मधारयः। कर्मधारयभेदो द्विगुः॥३॥
प्रायेणान्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिश्चतुर्थः॥४॥
प्रायेणोभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः पञ्चमः॥५॥
श्रीधरमुखोल्लासिनी
अब समासप्रकरण का आरम्भ होता है। समासज्ञान के विना संस्कृत का ज्ञान हो ही नहीं सकता। इसलिए समास का ज्ञान सन्धिज्ञान के साथ ही आवश्यक है। हिन्दी आदि भाषाओं में भी समास होता ही है। जैसे रामनाम इस वाक्य में राम का नाम= रामनाम, गङ्गा का जल=गङ्गाजल, देश का भक्त=देशभक्त, मत का अधिकार=मताधिकार आदि। हम हिन्दी आदि भाषाओं में समास हुए शब्दों का प्रयोग तो करते हैं, किन्तु यह नहीं जानते कि समास क्या होता है। आइये, समास के विषय में थोड़ी चर्चा करते हैं।
समास एक संज्ञा है। अनेकपदानामेकपदीभवनं समासः। अनेक पद मिलकर एकपद होना समास है। समास का विग्रह है- समसनं समासः अर्थात् संक्षिप्त होने को समास कहते हैं। दो या दो से अधिक शब्द जहाँ एक जगह, एकपद, एक अर्थ वाले बन जाते हैं, उसे समास कहते हैं। जैसे गङ्गायाः जलम् में गङ्गायाः षष्ठ्यन्त अलग पद है और जलम् प्रथमान्त अलग पद है। गङ्गायाः का अर्थ है- गङ्गा का और जलम् का अर्थ है पानी। ये पद भी अलग हैं और अर्थ भी अलग हैं। समास करके एक पद हो जायेगा- गङ्गाजलम् और अर्थ भी एक ही होगा- गङ्गाजल। इसलिए कहा जाता है कि समास में एकार्थीभाव-रूप सामर्थ्य रहता है। जहाँ पदार्थों की एक साथ उपस्थिति होती है, पृथक्-पृथक् नहीं, वहाँ एकार्थीभाव-रूप सामर्थ्य होता है। समास दो या दो से अधिक शब्दों के साथ होता है। समास के पाँच भेद होते हैं- केवल या सामान्यसमास, अव्ययीभावसमास, तत्पुरुषसमास, बहुव्रीहिसमास और द्वन्द्वसमास।
केवल-समास
इस समास में समास तो होता है किन्तु समासविशेष की संज्ञा नहीं होती है। इसीलिए इसे केवल-समास कहा जाता है। इसका उदाहरण है- भूतपूर्वः।
अव्ययीभाव-समास
इस समास में प्रायः अव्यय पूर्व में होता है। समास होने के बाद पूरा शब्द अव्ययीभावश्च से अव्यय बन जाता है। इस समास में पूर्वपद के अर्थ की प्रधानता होती है। इसका उदाहरण है- उपकृष्णम्=कृष्ण के समीप।
तत्पुरुष-समास
तत्पुरुषसमास में उत्तरपद अथवा परपद अर्थात् दूसरा या अन्तिम पद का अर्थ प्रधान होता है। इसका विग्रह करना भी सरल ही है। जैसे-
सः
पुरुषः
तत्पुरुषः
तं
पुरुषः
तत्पुरुषः
तेन
पुरुषः
तत्पुरुषः
तस्मै
पुरुषः
तत्पुरुषः
तस्मात्
पुरुषः
तत्पुरुषः
तस्य
पुरुषः
तत्पुरुषः
तस्मिन्
पुरुषः
तत्पुरुषः आदि।
बहुव्रीहि-समास-
इस समास में पूर्वपद का अर्थ भी प्रधान नहीं होता और उत्तरपद का अर्थ भी प्रधान नहीं होता किन्तु किसी अन्य ही पद का अर्थ प्रधान होता है। जैसे पीतानि अम्बराणि यस्य सः पीताम्बरः, पीले कपड़े हैं जिसके वह कृष्ण। समास होने के बाद यहाँ पर पीत का अर्थ भी प्रधान नहीं है और अम्बर का अर्थ भी प्रधान नहीं है किन्तु अन्य पदार्थ कृष्ण का अर्थ प्रधान हो गया। इसलिए बहुव्रीहिसमास अन्यपदार्थप्रधान माना जाता है।
द्वन्द्व-समास-
समास के लिए जितने शब्द लिये गये हैं, उन सभी शब्दों का अर्थ प्रधान होता है, अर्थात् उभयपदार्थप्रधान द्वन्द्वसमास होता है। इसके उदाहरण हैं- रामश्च कृष्णश्च रामकृष्णौ।
इसके अतिरिक्त भी नञ्, कर्मधारय, द्विगु, उपपदसमास आदि अनेक समास माने गये हैं किन्तु इन्हीं पाँचों के अन्तर्गत आने के कारण पृथक् नहीं बताया गया है। इस प्रकार से यहाँ दिग्दर्शन मात्र कराया गया है, विशेष रूप से तो उन्हीं प्रकरणों में देखेंगे।
विग्रहः-
समास में विग्रह बनाया जाता है। आपने विग्रह कृदन्त में भी बनाया है और आगे तद्धित में भी बनायेंगे। कृत्, तद्धित, समास आदि की वृत्तियों के अर्थबोध कराने के लिए जो वाक्य या पदावली होती है, उसे विग्रह कहते हैं। जैसे- राज्ञः पुरुषः यह राजपुरुष का विग्रह है। इसी प्रकार पीतानि अम्बराणि यस्य यह पीताम्बर का विग्रह है। विग्रह भी दो प्रकार के होते हैं- लौकिक विग्रह और अलौकिक विग्रह। लोक में प्रयुक्त होने वाला विग्रह लौकिक विग्रह है। जैसे- राज्ञः पुरुषः कहने से राजा का आदमी यह अर्थ लोक का सामान्य आदमी कर लेता है। अलौकिक विग्रह केवल व्याकरण की प्रक्रिया के लिए होता है। जैसे- राजन् ङस् पुरुष सु। राज्ञः में जो विभक्ति है, वह ङस् है और पुरुषः में जो विभक्ति है वह सु है। हम लोक में राजन् ङस् पुरुष सु का प्रयोग नहीं कर सकते। सबके समझने के लिए राज्ञः पुरुषः ही बोलना पड़ेगा। इसी प्रकार देवदत्तः गृहं