कर्तृकर्मद्वारा तन्निष्ठक्रियाया आधारः कारकमधिकरणं स्यात्।
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९०२- आधारोऽधिकरणम्। आधारः प्रथमान्तम्, अधिकरणं प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।
कर्ता कर्म के द्वारा उनमें रहने वाली क्रिया का आधार जो कारक वह अधिकरणसंज्ञक होता है।
क्रिया साक्षात् किसी आधार में नहीं रहती किन्तु कर्ता या कर्म द्वारा रहती है। जैसे देवदत्तः कटे आस्ते में आसन(रहना) क्रिया देवदत्त कर्ता के द्वारा कट में है और स्थाल्यां तण्डुलं पचति में पाक क्रिया तण्डुल कर्म के द्वारा स्थाली(पात्र) में है।
जिस में वस्तु स्थित रहे, वह आधार है। आधार में रहने वाली वस्तु आधेय होती है। जैसे बरतन में चावल। चावल के लिए बरतन आधार है, बरतन में रहने वाला चावल आधेय हुआ। इस सूत्र से आधार की अधिकरणसंज्ञा होती है।