Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 37
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VṛttiGovind
LSK 901
षष्ठीविभक्तिविधायकं विधिसूत्रम्
षष्ठी शेषे
Aṣṭādhyāyī 2.3.50
Vṛtti Varadarājācārya

कारकप्रतिपदिकार्थव्यतिरिक्तः स्वस्वामिभावादिसम्बन्धः शेषस्तत्र षष्ठी।

राज्ञः पुरुषः।

कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव।

सतां गतम्। सर्पिषो जानीते। मातुः स्मरति। एधो दकस्योपस्कुरुते।

भजे शम्भोश्चरणयोः।

इति षष्ठी।

९००- अपादाने पञ्चमी। अपादाने सप्तम्यन्तं, पञ्चमी प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अपादान में पञ्चमी होती है।

(पथिकः) ग्रामाद् आयाति। पथिक गाँव से आता है। यहाँ कर्ता पथिक है, आयाति क्रिया है और पथिक का ग्राम से अलगाव हो रहा है इसलिए पृथक्करण अथवा वियोग होना हुआ। गाँव से अलगाव हो रहा है, इसलिए गाँव ही ध्रुव है, अतः ग्राम की ध्रुवमपायेऽपादानम् से अपादानसंज्ञा और उससे ही अपादाने पञ्चमी से पञ्चमीविभक्ति हुई- ग्रामादायाति।

(अश्वारोही) धावतोऽश्वात् पतति। घुड़सवार दौड़ते हुए घोड़े से गिरता है। इस वाक्य में दौड़ता हुआ घोड़ा ध्रुव है अर्थात् दौड़ते हुए घोड़े से अलगाव हो रहा है, अतः उसकी अपादानसंज्ञा और पञ्चमीविभक्ति होकर धावतोऽश्वात् पतति बना। धावत् इस शतृ-प्रत्ययान्त शब्द में तो अश्वात् के विशेषण होने के कारण पञ्चमी है।

९०१- षष्ठी शेषे। षष्ठी प्रथमान्तं, शेषे सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।

कारक और प्रतिपदिकार्थ से भिन्न स्व-स्वामिभावादि सम्बन्ध को शेष कहते हैं। उस शेष अर्थ में षष्ठी विभक्ति होती है।

शेष अर्थात् बचा हुआ, प्रतिपदिकार्थ, कर्म, करण, अपादान, अधिकरण आदि संज्ञायें जहाँ नहीं हुई हों वह शेष है। शेष कई प्रकार के सम्बन्धों से जुड़ा है। जैसे- स्वस्वामिभावसम्बन्ध(एक स्वामी और दूसरी वस्तु), अवयवावयविभावसम्बन्ध(एक अङ्ग और दूसरा अङ्गी), जन्यजनकभावसम्बन्ध(एक पैदा करने वाला और दूसरा पैदा होने वाला), प्रकृतिविकृतिभावसम्बन्ध(एक प्रकृति और दूसरी उससे होने वाली विकृति, विकार) आदि। सम्बन्ध एक होता है किन्तु द्विष्ट अर्थात् दो में एक साथ रहता है। षष्ठी को कारक नहीं माना जाता है और इसके विधान में किसी संज्ञा की आवश्यकता नहीं होती है।

राज्ञः पुरुषः। राजा का आदमी। यहाँ राजा स्वामी है और पुरुष स्व है। स्वस्वामिभाव सम्बन्ध मानकर षष्ठी शेषे से राजन्-शब्द में षष्ठी हुई- राज्ञः पुरुषः।

मम गृहम्। मेरा घर। मैं स्वामी हूँ और घर स्व है। स्वस्वामिभावसम्बन्ध मानकर षष्ठी शेषे से अस्मत्-शब्द में षष्ठी विभक्ति हुई- मम गृहम्।

वृक्षस्य शाखा। वृक्ष की डाल। डाल अङ्ग है और वृक्ष अङ्गी, अवयवावयविभावसम्बन्ध मानकर षष्ठी शेषे से षष्ठी विभक्ति हुई- वृक्षस्य शाखा।

पितुः पुत्रम्। पिता का पुत्र। पिता जनक है और पुत्र जन्य। जन्यजनकभावसम्बन्ध में षष्ठी शेषे से षष्ठी हुई- पितुः पुत्रम्।

सुवर्णस्य कङ्कणम्। सोने का कंगन। सोना प्रकृति और उसको विकृत करके निर्मित कंगन विकृति है। प्रकृति-विकृतिभाव सम्बन्ध में षष्ठी शेषे से षष्ठी हुई- सुवर्णस्य कङ्कणम्।

कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठ्येव। कर्म आदि में भी सम्बन्धमात्र की विवक्षा करने पर षष्ठी होती है।

सतां गतम्। सज्जनों का गमन। इस वाक्य में सत् शब्द से सम्बन्ध की विवक्षा करने पर षष्ठी हुई। यहाँ गमन-क्रिया करने वाला होने से सज्जन कर्ता है और वह अनुक्त भी है। अतः अनुक्त कर्ता में कर्तृकरणयोस्तृतीया से तृतीया होकर सद्भिः होना चाहिए, परन्तु जब गमन-क्रिया और सज्जन कर्ता में क्रिया-कर्तृभाव सम्बन्ध की विवक्षा की जाती है तो सम्बन्ध-सामान्य में षष्ठी होकर सतां गतम् सिद्ध होता है।

सर्पिषो जानीते। घी के लिए प्रवृत्त होता है। इसमें सत् शब्द से सम्बन्ध की विवक्षा करने पर षष्ठी हुई। यहाँ पर घी के कारण भोजन में प्रवृत्त होता है, अतः सर्पिष्(घी) करण था। इसलिए तृतीया प्राप्त थी किन्तु सम्बन्ध के रूप में विवक्षा करने के कारण षष्ठी हो जाती है।

मातुः स्मरति। माता का स्मरण करता है। यहाँ क्रिया-कर्मभाव सम्बन्ध की विवक्षा की गई अतः मातृ से षष्ठी हो गई। इसी तरह एधो दकस्योपस्कुरुते। लकड़ी जल का गुण ग्रहण करता है। इस वाक्य में कर्म दक की सम्बन्धत्वेन विवक्षा करने से षष्ठी हो गई- दकस्य। एवं प्रकारेण भजे शम्भोश्चरणयोः। शम्भु के चरणों का भजन करता हूँ। कर्म में सम्बन्ध की विवक्षा करने के कारण चरणयोः में षष्ठी हुई है।

मूलकार ने कर्तृकर्मणोः कृति यह सूत्र नहीं पढ़ा है। छात्रों के अध्ययन के लिए अति उपयुक्त समझकर हम यहाँ व्याख्या में दे रहे हैं।

कर्तृकर्मणोः कृति। कर्ता च कर्म च कर्तृकर्मणी, तयोः कर्तृकर्मणोः। कर्तृकर्मणोः षष्ठ्यन्तं, कृति सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। षष्ठी की अनुवृत्ति आती है।

कृत् के योग होने पर कर्ता और कर्म में षष्ठी होती है।

कृष्णस्य कृतिः। कृष्ण की रचना। कृ धातु से कितन् प्रत्यय होकर कृतिः बना है। इसके योग में कर्ता कृष्ण में कर्तृकर्मणोः कृति से षष्ठी हुई।

जगतः कर्ता कृष्णः। संसार के कर्ता कृष्ण हैं। कृ धातु से तृच् प्रत्यय होकर कर्ता बना है। इसके योग में कर्म जगत् में कर्तृकर्मणोः कृति से षष्ठी हुई।