Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 37
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VṛttiGovind
LSK 898
चतुर्थीविभक्तिविधायकं विधिसूत्रम्
नमःस्वस्तिस्वाहास्वधालम्वषड्योगाच्च
Aṣṭādhyāyī 2.3.16
Vṛtti Varadarājācārya

एभिर्योगे चतुर्थी। हरये नमः। प्रजाभ्यः स्वस्ति। अग्नये स्वाहा।

पितृभ्यः स्वधा। अलमिति पर्याप्त्यर्थग्रहणम्। तेन दैत्येभ्यो हरिरलं प्रभुः

समर्थः शक्त इत्यादि।

इति चतुर्थी।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

कर्ता, दान आदि कर्म के द्वारा जिससे सम्बन्ध करना चाहता है, उसकी सम्प्रदानसंज्ञा होती है।

सम्यक् प्रदानं सम्प्रदानम्, इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिसको वापस न लेने के लिए ही दिया जाता है, उसकी ही सम्प्रदानसंज्ञा होती है। जैसे- विप्राय गां ददाति में विप्र को गाय हमेशा के लिए दी गई, इसलिए विप्र की सम्प्रदानसंज्ञा होती है किन्तु रजकस्य वस्त्रं ददाति में धोबी को कपड़ा वापस लेने के लिए ही दिया जाता है। इसलिए रजक की सम्प्रदानसंज्ञा नहीं होती है। अतः रजकस्य वस्त्रं ददाति होता है।

८९८- नमस्स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च। नमश्च स्वस्तिश्च स्वाहा च स्वधा च अलं च वषट् च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो नमस्स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषडः, तेषां योगो नमस्स्वस्तिस्वाहास्वधा-लंवषड्योगस्तस्मान्नमस्स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगात्। चतुर्थी सम्प्रदाने से चतुर्थी की अनुवृत्ति आती है।

नमस्, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलं, वषट् के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है।

इस सूत्र के द्वारा सम्प्रदानसंज्ञा की अपेक्षा नहीं की जाती और कारक की भी