Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 37
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VṛttiGovind
LSK 899
अपादानसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
ध्रुवमपायेऽपादानम्
Aṣṭādhyāyī 1.4.24
Vṛtti Varadarājācārya

अपायो विश्लेषस्तस्मिन् साध्ये यद् ध्रुवमवधिभूतं कारकं तदपादानसंज्ञं स्यात्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अपेक्षा नहीं होती। जैसे कर्मसंज्ञा, करणसंज्ञा कारक की ही होती है, वैसे यहाँ नहीं है। नमस् आदि ये शब्द जिस शब्द के साथ सम्बन्ध रखते हैं, उनमें चतुर्थी हो जायेगी। किसी पद-विशेष को देखकर होने वाली विभक्ति को उपपदविभक्ति कहते हैं और कारक को मानकर होने वाली विभक्ति को कारकविभक्ति कहते हैं। इस सूत्र से विधीयमान विभक्ति उपपदविभक्ति है।

हरये नमः। हरि को नमस्कार है। यहाँ पर हरि-शब्द नमः से सम्बन्धित अथवा युक्त है क्योंकि हरि को ही नमस्कार किया गया है। अतः नमस्स्वस्तिस्वाहा-स्वधालंवषड्योगाच्च से हरि में चतुर्थी विभक्ति हो गई- हरये नमः।

प्रजाभ्यः स्वस्ति। प्रजाओं का कल्याण हो। यहाँ पर स्वस्ति-शब्द प्रजा-शब्द से सम्बन्धित अथवा युक्त है क्योंकि प्रजाओं का ही कल्याण कहा जा रहा है। अतः नमस्स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च से प्रजाभ्यः में चतुर्थी विभक्ति हो गई- प्रजाभ्यः स्वस्ति।

अग्नये स्वाहा। यह अग्नि के लिए हवि(आहुति)। यहाँ पर स्वाहा-शब्द अग्नि-शब्द से सम्बन्धित अथवा युक्त है क्योंकि हवि अग्नि का नामोच्चारण करके ही दी जा रही है। अतः नमस्स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च से अग्नये में चतुर्थी विभक्ति हुई- अग्नये स्वाहा।

पितृभ्यः स्वधा। पितरों को यह अन्न और जल। यहाँ पर स्वधा-शब्द पितृ-शब्द से सम्बन्धित अथवा युक्त है क्योंकि तर्पण आदि पितरों के लिए ही दिया जाता है। अतः नमस्स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च से पितृभ्यः में चतुर्थी विभक्ति हो गई- पितृभ्यः स्वधा।

अलमिति पर्याप्त्यर्थग्रहणम्। इस सूत्र में अलम् से पर्याप्ति अर्थात् समर्थ अर्थ वाले शब्दों का ग्रहण किया गया है। जैसे अलम् का अर्थ समर्थ है, उसी प्रकार प्रभु, समर्थ, शक्त का अर्थ भी समर्थ=पर्याप्त है, अतः उन सभी के योग में चतुर्थी की जाती है। जैसे- दैत्येभ्यो हरिरलं, दैत्येभ्यो हरिः प्रभुः, दैत्येभ्यो हरिः समर्थः, दैत्येभ्यो हरिः शक्तः इत्यादि वाक्यों में अलम्, प्रभुः, समर्थः, शक्तः के योग में चतुर्थी हुई। दैत्यों को जीतने के लिए हरि समर्थ हैं।

८९९- ध्रुवमपायेऽपादानम्। ध्रुवं प्रथमान्तम्, अपाये सप्तम्यन्तम्, अपादानं प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

अपाय(अलगाव) होने में जो ध्रुव है, उसकी अपादान-संज्ञा होती है।

वियोग, जुदाई, अलग होने को अपाय कहते हैं और वह अलगाव जिससे होता है उसे ध्रुव कहा गया है। ध्रुव का अर्थ अटल या अचल नहीं है, उसका अर्थ केवल वियोग जिससे होता है, वह है। इसलिए धावतोऽश्वात् पतति में पतन-क्रिया चलते हुए घोड़े से होने पर भी घोड़े की अपादानसंज्ञा होती है। इस अलग होने में जो ध्रुव उसकी अपादानसंज्ञा इस सूत्र से हो जाती है। अपादानसंज्ञा का फल अपादाने पञ्चमी से पञ्चमीविभक्ति होना है।