Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 37
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VṛttiGovind
LSK 897
चतुर्थीविभक्तिविधायकं विधिसूत्रम्
चतुर्थी सम्प्रदाने
Aṣṭādhyāyī 2.3.13
Vṛtti Varadarājācārya

विप्राय गां ददाति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८९७- चतुर्थी सम्प्रदाने। चतुर्थी प्रथमान्तं, सम्प्रदाने सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अनभिहिते का अधिकार है।

अनुक्त सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति का विधान होती है।

( यजमानः ) विप्राय गां ददाति। ( यजमानः ) विप्र को गौ देता है। कर्ता यजमान, क्रिया ददाति, दानक्रिया के द्वारा इष्टतम कारक गो, अतः गो को इष्टतम कारक मानकर उसकी कर्मसंज्ञा, द्वितीयाविभक्ति। यहाँ पर दानकर्म के द्वारा अभिप्रेत है विप्र, उसकी कर्मणा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम् से सम्प्रदानसंज्ञा और चतुर्थी सम्प्रदाने से चतुर्थीविभक्ति हुई, विप्राय गां ददाति। ददाति में लट्-लकार कर्ता अर्थ में है, कर्ता अर्थ में प्रत्यय होने के कारण कर्ता उक्त है, अतः कर्म आदि सभी अनुक्त हुए तो सम्प्रदान भी अनुक्त हुआ। रजकस्य वस्त्रं ददाति में धोबी को कपड़ा वापस लेने के लिए ही दिया जाता है। इसलिए रजक की सम्प्रदानसंज्ञा न होने से चतुर्थी भी नहीं हुई। अतः सम्बन्ध-सामान्य में षष्ठी हो गई, रजकस्य वस्त्रं ददाति।