क्रियायां स्वातन्त्र्येण विवक्षितोऽर्थः कर्ता स्यात्।
८९३- स्वतन्त्रः कर्ता। स्वतन्त्रः प्रथमान्तं, कर्ता प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।
क्रिया में स्वतन्त्र रूप से विवक्षित अर्थ कर्तृसंज्ञक होता है।
वाक्य में कर्ता, कर्म, क्रिया आदि होते हैं। वाक्य में जो प्रधान होता है या क्रिया की सिद्धि जिससे होती है, वह जो वाक्य में प्रधानतया अवस्थित रहता है, जिसके विना क्रिया हो ही नहीं पाती है, ऐसे कारक की कर्तृसंज्ञा(कर्ता-संज्ञा) इस सूत्र से की जाती है। कर्ता ही क्रिया का जनक होता है। कर्ता के अनुसार ही क्रिया में लिङ्ग, संख्या आदि का निर्धारण होता है। जैसे राम पढ़ता है इस वाक्य में क्रिया है- पढ़ता है, इस क्रिया की सिद्धि में राम की अनिवार्य भूमिका है, उसके विना क्रिया की सिद्धि हो ही नहीं सकती। अतः राम को कर्ता माना गया।