अपादानादिविशेषैरविवक्षितं कारकं कर्मसंज्ञं स्यात्।
दुह्-याच्-पच्-दण्ड्-रुधि-प्रच्छि-चि-ब्रू-शासु-जि-मथ्-मुषाम्।
कर्मयुक् स्यादकथितं तथा स्यान्नी-ह्-कृष्-वहाम्॥
गां दोग्धि पयः। बलिं याचते वसुधाम्। तण्डुलानोदनं पचति।
गर्गान् शतं दण्डयति। ब्रजमवरुणद्धि गाम्। माणवकं पन्थानं पृच्छति।
वृक्षमवचिनोति फलानि। माणवकं धर्मं ब्रूते शास्ति वा।
शतं जयति देवदत्तम्। सुधां क्षीरनिधिं मथ्नाति। देवदत्तं शतं मुष्णाति।
ग्राममजां नयति हरति कर्षति वहति वा।
अर्थनिबन्धनेयं संज्ञा।
बलिं भिक्षते वसुधाम्। माणवकं धर्मं भाषते अभिधत्ते वक्तीत्यादि।
इति द्वितीया।
८९२- अकथितं च। अकथितं प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। कर्तुरीप्सिततमं कर्म से कर्म की अनुवृत्ति आती है और कारके का अधिकार है।
अपादान आदि कारकों के द्वारा अविवक्षित कारक कर्मसंज्ञक होता है।
अकथित का तात्पर्य है न कहना अथवा कहने की इच्छा न करना। किसके द्वारा? अपादान, सम्प्रदान, करण, अधिकरण के द्वारा। यदि वक्ता की तत्तत् कारक के रूप में कहने की इच्छा न हुई तो उन कारकों को अकथित कहा जायेगा। ऐसे अकथित सामान्य कारकों की इस सूत्र से कर्मसंज्ञा हो जायेगी।
इस प्रकार से सभी अकथित की कर्मसंज्ञा प्राप्त हो रही थी तो इसके लिए श्लोक के द्वारा नियम बनाया कि- जिस किसी भी धातु के योग में अकथितों की कर्मसंज्ञा नहीं होती किन्तु दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मथ्, मुष्, नी, ह्, कृष्, वह् इन धातुओं के योग में ही जो अकथित अर्थात् वक्ता के द्वारा अपादान आदि विभक्ति के रूप में अविवक्षित हों उनकी कर्मसंज्ञा होती है, अन्यों की नहीं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि अपादान आदि विभक्तियाँ होंगी ही नहीं। वे विभक्तियाँ तो होती ही हैं किन्तु जब वक्ता के द्वारा अपादान आदि तत्तद् रूप में कहने की इच्छा नहीं की गई, तब इस सूत्र के द्वारा उनकी कर्मसंज्ञा की जायेगी। उदाहरण आगे देखिये-
देवदत्तो गां पयः दोग्धि (देवदत्त गाय से दूध दुहता है) इस वाक्य में कर्ता है देवदत्त, क्रियापद है दोग्धि (दुह् धातु, अदादि, लट्, प्रथमपुरुष एकवचन), दोहनक्रिया द्वारा कर्ता को अत्यन्त अभीष्ट वस्तु है पयः=दूध। अतः पयस् को इष्टतम कर्म मानकर कर्तुरीप्सिततमं कर्म से कर्मसंज्ञा होकर द्वितीया विभक्ति पहले ही हो चुकी है। यहाँ वक्ता गो को अपादान के रूप में कहना नहीं चाहता अपितु उपयुज्यमान पयः के प्रति निमित्त
मानता है। इस प्रकार अपादान के रूप में कहने की इच्छा न होने के कारण गो यह अविवक्षित हुआ। उसकी अकथितं च से कर्मसंज्ञा हो गई और कर्मणि द्वितीया से द्वितीयाविभक्ति भी हो गई- गां दोग्धि पयः। यहाँ पर अपादान होने के कारण पञ्चमीविभक्ति होकर गोः दोग्धि पयः भी हो सकता है। दो कर्म हो जाने से एक प्रधान कर्म होगा जिसे इष्टतम कर्म कहते हैं और एक अप्रधान कर्म होगा जिसे अकथित कर्म कहते हैं। दो कर्म होने के कारण यह धातु द्विकर्मक माना जाता है। जिस वाक्य में अकथितं च की प्रवृत्ति होती है, उस वाक्य का धातु द्विकर्मक ही होगा। ऐसे द्विकर्मक धातुओं की संख्या सोलह है। ये हैं- दुह, याच, पच, दण्ड, रुध, प्रच्छ, चि, बू, शास्, जि, मथ, मुष्, नी, हृष्, कृष् और वह।
इस सूत्र से की जाने वाली संज्ञा अर्थनिबन्धना है अर्थात् इन धातुओं से मिलते-जुलते अर्थ वाले अन्य धातुओं के योग में भी अकथित की कर्मसंज्ञा की जायेगी। अब आगे व्याख्या में उक्त सभी धातुओं के क्रमशः उदाहरण दे रहे हैं।
( देवदत्तः ) गां दोग्धि पयः। इसका उदाहरण तो आपने ऊपर देख ही लिया है।
( वामनः ) बलिं याचते वसुधाम्। वामन भगवान् बलि से पृथ्वी माँगते हैं। कर्ता वामन, क्रिया याचते, इष्टतम कर्म वसुधा और अकथित कर्म बलि है। इष्टतम कर्म में कर्मसंज्ञा और द्वितीया विभक्ति तो निर्विवाद है ही। यहाँ पर अपादान होने के कारण पञ्चमीविभक्ति प्राप्त होकर बलेः वसुधां याचते ऐसा ही सम्भव हो रहा था किन्तु कर्ता के द्वारा अपादान के रूप में कहने की इच्छा न रखने पर अकथितं च से कर्मसंज्ञा होकर बलि में द्वितीयाविभक्ति हुई। अतः बलिं याचते वसुधाम् भी बन गया।
( पाचकः ) तण्डुलानोदनं पचति। रसोइया चावलों से भात पकाता है। कर्ता पाचक, क्रिया पचति, इष्टतम कर्म ओदन और अकथित कर्म तण्डुल है। यहाँ पर तण्डुल में करण होने के कारण तृतीया विभक्ति की सम्भावना है किन्तु वक्ता से अविवक्षित होने के कारण अकथित मानकर अकथितं च से कर्मसंज्ञा होकर तण्डुल में द्वितीयाविभक्ति हुई- तण्डुलान् ओदनं पचति।
( प्रधानः ) गर्गान् शतं दण्डयति। सरपंच गर्गों से सौ रुपये जुर्माना लगाता है। कर्ता प्रधान, क्रिया दण्डयति, इष्टतम कर्म शत और अकथित कर्म गर्ग है। यहाँ पर गर्ग में अपादान होने के कारण पञ्चमीविभक्ति की सम्भावना है किन्तु वक्ता से अविवक्षित होने के कारण अकथित मानकर अकथितं च से कर्मसंज्ञा होकर गर्ग में द्वितीयाविभक्ति हुई- गर्गाञ्छतं दण्डयति।
( कृष्णः ) व्रजमवरुणद्धि गाम्। श्रीकृष्ण व्रज में गौ को रोकते हैं। कर्ता कृष्ण, क्रिया अवरुणद्धि, इष्टतम कर्म गौ और अकथित कर्म व्रज है। यहाँ पर व्रज में अधिकरण होने के कारण सप्तमीविभक्ति की सम्भावना है किन्तु वक्ता से अधिकरण अविवक्षित होने के कारण अकथित मानकर अकथितं च से कर्मसंज्ञा होकर व्रज में द्वितीयाविभक्ति हुई- व्रजम् अवरुणद्धि गाम्।
( पथिकः ) माणवकं पन्थानं पृच्छति। पथिक बच्चे से मार्ग पूछता है। कर्ता पथिक, क्रिया पृच्छति, इष्टतम कर्म पन्था और अकथित कर्म माणवक है। यहाँ पर माणवक में अपादान की सम्भावना है किन्तु वक्ता से अपादान अविवक्षित होने से अकथित मानकर अकथितं च से कर्मसंज्ञा होकर माणवक में द्वितीयाविभक्ति हुई- माणवकं पन्थानं पृच्छति।
( कृषकः ) वृक्षमवचिनोति फलानि। कृषक वृक्ष से फल तोड़ता या चुनता है। कर्ता कृषक, क्रिया चिनोति, इष्टतम कर्म फल और अकथित कर्म वृक्ष है। यहाँ पर वृक्ष में अपादान होने के कारण पञ्चमीवभक्ति की सम्भावना है किन्तु वक्ता द्वारा अपादान अविवक्षित होने के कारण अकथित मानकर अकथित च से कर्मसंज्ञा होकर वृक्ष में द्वितीयाविभक्ति हुई- वृक्षम् अवचिनोति फलानि।
( पिता ) माणवकं धर्मं ब्रूते, शास्ति वा। पिता बच्चे को ( ब्रह्मचारी के लिए ) धर्म बताता है। ब्रू और शास् धातु का योग। कर्ता पिता, क्रिया ब्रूते और शास्ति, इष्टतम कर्म धर्म और अकथित कर्म माणवक है। यहाँ पर माणवक में सम्प्रदान होने के कारण चतुर्थी विभक्ति की सम्भावना है किन्तु वक्ता से सम्प्रदान अविवक्षित होने के कारण अकथित मानकर अकथित च से कर्मसंज्ञा होकर माणवक में द्वितीया विभक्ति हुई- माणवकं धर्मं ब्रूते, शास्ति वा।
( यज्ञदत्तः ) शतं जयति देवदत्तम्। यज्ञदत्त देवदत्त से सौ जीतता है। कर्ता यज्ञदत्त, क्रिया जयति, इष्टतम कर्म शत और अकथित कर्म देवदत्त है। यहाँ पर देवदत्त में अपादान होने के कारण पञ्चमीवभक्ति की सम्भावना है किन्तु वक्ता से अपादान अविवक्षित करने के कारण अकथित मानकर अकथित च से कर्मसंज्ञा होकर देवदत्त में द्वितीयाविभक्ति हुई- शतं जयति देवदत्तम्।
( देवासुराः ) सुधां क्षीरनिधिं मध्नन्ति। देव और दानव क्षीरसागर से अमृत मथते हैं। कर्ता देवासुर, क्रिया मध्नन्ति, इष्टतम कर्म सुधा और अकथित कर्म क्षीरनिधि है। यहाँ पर क्षीरनिधि में अपादान या अधिकरण होने के कारण पञ्चमीवभक्ति या सप्तमीवभक्ति की सम्भावना है किन्तु वक्ता से अविवक्षित होने के कारण अकथित मानकर अकथित च से कर्मसंज्ञा होकर क्षीरनिधि में द्वितीया विभक्ति हुई- सुधां क्षीरनिधिं मध्नन्ति।
( रामदेवः ) देवदत्तं शतं मुष्णाति। रामदेव देवदत्त से सौ रुपये चुराता है। कर्ता रामदेव, क्रिया मुष्णाति, इष्टतम कर्म शत और अकथित कर्म देवदत्त है। यहाँ पर देवदत्त में अपादान होने के कारण पञ्चमीवभक्ति की सम्भावना है किन्तु वक्ता से अपादान अविवक्षित होने के कारण अकथित मानकर अकथित च से कर्मसंज्ञा होकर देवदत्त में द्वितीया विभक्ति हुई- शतं मुष्णाति।
( पशुपालः ) ग्राममजां नयति, हरति, कर्षति, वहति। पशुपालक गाँव में बकरी को ले जाता है। यहाँ नी, हृष्, कृष् और वह् चार धातुओं का प्रयोग है। कर्ता पशुपाल, क्रिया नयति, हरति, कर्षति, वहति, इष्टतम कर्म अजा और अकथित कर्म ग्राम है। यहाँ पर ग्राम में अधिकरण होने के कारण सप्तमीवभक्ति की सम्भावना है किन्तु वक्ता से अधिकरण अविवक्षित होने के कारण अकथित मानकर अकथित च से कर्मसंज्ञा होकर ग्राम में द्वितीया विभक्ति हुई- ग्रामम् अजां नयति, हरति, कर्षति वहति वा।
अर्थनिबन्धनेयं संज्ञा। इस अकथित च सूत्र से जिन धातुओं के योग में कर्मसंज्ञा होती है, उन धातुओं का जो अर्थ, यदि वही अर्थ अन्य किसी धातु का भी हो तो उस धातु के योग में अकथित कर्म मान लिया जाता है। जैसे- याच् धातु का माँगना अर्थ है और भिक्षु धातु का अर्थ भी माँगना ही है। इसलिए समानार्थक भिक्षु धातु के योग में कर्मसंज्ञा होकर बलिं भिक्षुते वसुधाम् बनता है। जैसे ब्रू धातु के योग में अकथित कर्म सम्भव है, उसी प्रकार से समानार्थक भाष्, वच्, अभि+धा के योग में भी अकथित
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मानकर कर्मसंज्ञा करके माणवकं धर्म ब्रूते, शास्ति की तरह माणवकं धर्म भाषते, वक्ति, अभिधत्ते बना सकते हैं।
लघुसिद्धान्तकौमुदी में अपठित किन्तु अत्यन्त उपयोगी निम्न सूत्र को यहाँ दिया जा रहा है। छात्र इस पर अवश्य ध्यान दें- गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ। गतिश्च बुद्धिश्च प्रत्यवसानञ्च गतिबुद्धिप्रत्यवसानानि, तानि अर्थः येषां ते गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थाः(धातवः)। शब्दः कर्म येषां ते शब्दकर्माणः। अविद्यमानं कर्म येषां ते अकर्मकाः। गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थश्च शब्दकर्माणश्च अकर्मकाश्च ते गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थ-शब्दकर्माकर्मकास्तेषाम्। न णिः अणिः, अणौ कर्ता अणिकर्ता। गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थ-शब्दकर्माकर्मकाणां षष्ठ्यन्तम्, अणिकर्ता प्रथमान्तं, स प्रथमान्तं, णौ सप्तम्यन्तम् अनेकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में कारके का अधिकार है और कर्तुरीप्सिततमं कर्म से कर्म की अनुवृत्ति आती है।
गति अर्थ वाले धातु, ज्ञान अर्थ वाले धातु, भोजन अर्थ वाले धातु, शब्द सम्बन्धी कर्म वाले धातु और अकर्मक धातुओं के अण्यन्त अवस्था के कर्ता की ण्यन्त अवस्था में कर्मसंज्ञा होती है।
इस सूत्र के अर्थ को समझने के पहले ण्यन्त-कर्ता और अण्यन्त कर्ता को समझना जरूरी है। आपने ण्यन्तप्रकरण में देखा कि पठति से पाठयति, चलति से चालयति, भवति से भावयति आदि रूप बने थे। किसी भी धातु से प्रेरणा अर्थ में णिच् होकर पुनः उसकी धातुसंज्ञा होकर लट् आदि लकार आते हैं। णिच्-प्रत्यय लगने के बाद धातु ण्यन्त हो जाता है। णिच् नहीं हुआ है तो वह अण्यन्त कहलायेगा। सामान्य धातु का कर्ता अन्य कुछ होता है तो णिजन्त धातु का कर्ता अन्य ही होता है। जैसे देवदत्तः पठति (देवदत्त पढ़ता है) में पठ् धातु है और अण्यन्त है। अण्यन्त अवस्था का कर्ता देवदत्तः है। अब पठ् धातु से णिच् कर दें, ण्यन्त हो जायेगा, पाठयति बनेगा। पाठयति का अर्थ हुआ-पढ़ाता है। पढ़ने वाला देवदत्त था तो पढ़ाने वाला अन्य कोई होगा। आचार्य पढ़ाते हैं, अतः पढ़ाने के कर्ता आचार्य हुए। तब वाक्य बना- आचार्यः देवदत्तं पाठयति। इस प्रकार से आपने देखा कि अण्यन्त अवस्था में जो देवदत्त कर्ता था वह ण्यन्त अवस्था में कर्म हुआ। देवदत्तः पठति, आचार्यः तं देवदत्तं पाठयति- देवदत्त पढ़ता है और आचार्य उस देवदत्त को पढ़ाते हैं। दो वाक्यों में एक अण्यन्त अवस्था का वाक्य है तो एक ण्यन्त अवस्था का वाक्य है। यह सूत्र अण्यन्त अवस्था के कर्ता की ण्यन्त अवस्था में कर्मसंज्ञा करता है। उक्त वाक्य में अण्यन्त अवस्था का कर्ता देवदत्त था, उसी की इस सूत्र से कर्मसंज्ञा हुई। कर्मसंज्ञा का फल कर्मणि द्वितीया से द्वितीया विभक्ति करना है। इस वाक्य में पूर्व कर्ता देवदत्त में द्वितीया विभक्ति हुई- आचार्यः देवदत्तं पाठयति। अण्यन्त अवस्था में कर्ता के साथ क्रिया तो रहती ही है, इष्टतम कर्म भी रह सकता है और उसकी कर्तुरीप्सिततमं कर्म से कर्मसंज्ञा होकर उसमें द्वितीया विभक्ति होती है। वह इस सूत्र का विषय नहीं है।
सारे धातुओं के अण्यन्त अवस्था के कर्ता को ण्यन्त में कर्मसंज्ञा नहीं करता किन्तु कुछ ही धातुओं में यह कार्य होता है। जैसे गति अर्थ वाले धातु, ज्ञान अर्थ वाले धातु, भोजन अर्थ वाले धातु, शब्द सम्बन्धी कर्म वाले धातु और अकर्मक धातु हों, उन्हीं के अण्यन्त अवस्था के कर्ता को ण्यन्त अवस्था में कर्मसंज्ञा होती है। धातुपाठ में जिस धातु का अर्थ गत्याम्, गतौ आदि लिखा है ऐसे धातु, ज्ञान अर्थ वाले धातु, भोजन अर्थ वाले धातु,
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जिन धातुओं का कर्म शब्द से सम्बन्ध रहता है, जैसे पढ़ाना आदि और जिन धातुओं में कर्म ही नहीं लगते ऐसे अकर्मक धातुओं के अण्यन्त की अवस्था को पहले देखना होगा। उसके बाद उन धातुओं में णिच् प्रत्यय अर्थात् ण्यन्त का रूप बनाना होगा। फिर अण्यन्त अवस्था के कर्ता को वर्तमान ण्यन्त अवस्था में इस सूत्र के द्वारा कर्मसंज्ञा की जायेगी। इनके उदाहरण क्रमशः बताये जा रहे हैं।
रामः कृष्णं गृहं गमयति। राम कृष्ण को घर भेजता है। यह गत्यर्थक गम् धातु का उदाहरण है। पहले इसमें अण्यन्त का वाक्य बनाइये- कृष्णः गृहं गच्छति। कर्ता कृष्णः, इष्टतम कर्म गृहम्, क्रिया गच्छति है। जाने वाले कृष्ण को भेजने वाला राम है। गच्छति इस अण्यन्त रूप को हेतुमति च से णिच् करके ण्यन्त में बदल दिया। गच्छति से गमयति बना। अण्यन्त अवस्था में कृष्ण कर्ता था तो उसको भेजने वाला राम ण्यन्त में कर्ता बना। गत्यर्थक धातु का योग है। अण्यन्त अवस्था के कर्ता कृष्ण की गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थ-शब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ से कर्मसंज्ञा हो गई और उसमें द्वितीया विभक्ति हो गई रामः कृष्णं गृहं गमयति॥
आचार्यश्छात्रं कौमुदीं बोधयति। आचार्य छात्र को कौमुदी समझाता है। यह बुद्ध्यर्थक बुध् धातु का उदाहरण है। पहले इसमें अण्यन्त का वाक्य बनाइये- छात्रः कौमुदीं बुध्यते। (बुध अवबोधने, दिवादि, आत्मनेपदी)। कर्ता छात्रः, इष्टतम कर्म कौमुदीम्, क्रिया बुध्यते है। समझने वाले छात्र को समझाने वाला आचार्य है। बुध्यते इस अण्यन्त रूप को हेतुमति च से णिच् करके ण्यन्त में बदल दिया। बुध्यते से बोधयति बना। अण्यन्त अवस्था में छात्र कर्ता था तो उसको समझाने वाला आचार्य ण्यन्त में कर्ता बना। बुद्ध्यर्थक धातु का योग है। अण्यन्त अवस्था के कर्ता छात्र की गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ से कर्मसंज्ञा हो गई और उसमें द्वितीया विभक्ति हो गई- आचार्यः छात्रं कौमुदीं बोधयति।
माता पुत्रं क्षीरान्नं भोजयति। माता पुत्र को खीर खिलाती है। यह भोजनार्थक भुज् धातु का उदाहरण है। (भुज पालनाभ्यवहारयोः, रुधादि, भोजन अर्थ में आत्मनेपदी)। पहले इसमें अण्यन्त का वाक्य बनाइये- पुत्रः क्षीरान्नं भुङ्क्ते। कर्ता पुत्रः, इष्टतम कर्म क्षीरान्नं, क्रिया भुङ्क्ते है। खाने वाले पुत्र को खिलाने वाली माता है। इस अण्यन्तरूप को हेतुमति च से णिच् करके ण्यन्त में बदल दिया। भुङ्क्ते से भोजयति बना। अण्यन्त अवस्था में पुत्र कर्ता था तो उसको खिलाने वाली माता ण्यन्त में कर्ता बनी। भोजनार्थक धातु का योग है। अण्यन्त अवस्था के कर्ता पुत्र की गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ से कर्मसंज्ञा हो गई और उसमें द्वितीया विभक्ति हो गई- माता पुत्रं क्षीरान्नं भोजयति।
गुरुः शिष्यान् वेदार्थान् पाठयति। गुरु शिष्यों को वेदार्थ (वेदों के अर्थों को) पढ़ाते हैं। यह शब्दकर्मक पठ् धातु का उदाहरण है। पहले इसमें अण्यन्त का वाक्य बनाइये- शिष्यः वेदार्थं पठति। कर्ता शिष्यः, इष्टतम कर्म वेदार्थम्, क्रिया पठति है। पढ़ने वाले शिष्य को पढ़ाने वाला गुरु है। पठति इस अण्यन्त रूप को हेतुमति च से णिच् करके ण्यन्त में बदल दिया। पठति से पाठयति बना। अण्यन्त अवस्था में शिष्य कर्ता था तो उसको पढ़ाने वाला गुरु ण्यन्त में कर्ता बना। शब्दकर्मक धातु का योग है। अण्यन्त अवस्था के कर्ता शिष्य की गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थ- शब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ से कर्मसंज्ञा हो गई और उसमें द्वितीया विभक्ति हो गई- गुरुः शिष्यान् वेदार्थान् पाठयति।
कौशल्या रामं शाययति। कौशल्या राम को सुलाती है। यह अकर्मक (अदादि, आत्मनेपदी) शी धातु का उदाहरण है। पहले इसमें अण्यन्त का वाक्य बनाइये- रामः शेते। कर्ता राम, अकर्मक धातु होने के कारण इष्टतम कर्म नहीं है, क्रिया शेते है। सोने वाले राम को सुलाने वाली कौशल्या है। शेते इस अण्यन्त रूप को ण्यन्त में अर्थात् हेतुमति च से णिच् करके ण्यन्त में बदल दिया। शेते से शाययति बना। अण्यन्त अवस्था में राम कर्ता था तो उसको सुलाने वाली कौशल्या ण्यन्त में कर्ता बनी। अकर्मक धातु का योग है। अण्यन्त अवस्था के कर्ता राम की गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थ- शब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ से कर्मसंज्ञा हो गई और उसमें द्वितीया विभक्ति हो गई- कौशल्या रामं शाययति।
क्रिया की सिद्धि अर्थात् निष्पत्ति में जो जो साधक अर्थात् निमित्त होते हैं उन्हें कारक कहते हैं। जैसे- कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण। इन कारकों में से जो सबसे स्वतन्त्र हो अर्थात् जो क्रिया का निष्पादन करता हो, उसको कर्ता कहा गया है। तात्पर्य यह है कि जैसे अन्य कारक कर्ता से प्रेरित होकर क्रिया का निष्पादन करते हैं वैसे कर्ता अन्य कारकों से प्रेरित होकर क्रिया का निष्पादन नहीं करता अपितु स्वतन्त्रतया क्रिया का जनक होता है। कर्तृवाच्य में जिस प्रकार से कर्ता के अनुसार क्रिया में भी पुरुष और वचन की व्यवस्था की जाती है, उस प्रकार कर्म आदि के अनुसार नहीं है। इसलिए क्रिया में कर्ता स्वतन्त्र विवक्षित होता है।