अनुक्ते कर्मणि द्वितीया स्यात्। हरिं भजति।
अभिहिते तु कर्मादौ प्रथमा। हरिः सेव्यते। लक्ष्म्या सेवितः।
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८९१- कर्मणि द्वितीया। कर्मणि सप्तम्यन्तं, द्वितीया प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अनभिहिते का अधिकार है। अभिहित का अर्थ उक्त होता है, न अभिहितः=अनभिहितः=अनुक्तस्तस्मिन् अनभिहिते।
अनुक्त कर्म में द्वितीयाविभक्ति होती है।
अनुक्त कर्म अर्थात् जिस कर्म-रूप अर्थ को कृत्, तिङ् आदि के द्वारा न कहा गया हो अर्थात् कर्म अर्थ में कृत् आदि प्रत्यय न हुए हों वह। यस्मिन् प्रत्ययः स उक्तः। जिस अर्थ में प्रत्यय होता है, वह उक्त होता है। मोटे तौर पर जैसे- रामः पुस्तकं पठति इस वाक्य में पठ् धातु से लट् लकार लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः के द्वारा कर्ता अर्थ में हुआ। इसलिए इस वाक्य का कर्ता उक्त हुआ। एक उक्त होता है तो शेष स्वतः अनुक्त हो जाते हैं। इसलिए इस वाक्य में जो कर्मवाचक शब्द है पुस्तक, वह अनुक्त
हुआ। कर्म के अनुक्त होने पर कर्मणि द्वितीया इस सूत्र के द्वारा द्वितीयाविभक्ति का विधान होता है तो पुस्तक से द्वितीया विभक्ति हुई-पुस्तकम्। इसी तरह सभी जगह समझना चाहिए। उक्त और अनुक्त की व्यवस्था को भलीभाँति समझ लेना चाहिए।
पहले तो कर्म क्या है यह जानना और उसके बाद कर्म उक्त है कि अनुक्त यह जानना चाहिए। कर्ता अर्थ में प्रत्यय हुआ है तो कर्ता उक्त तथा कर्म अनुक्त होता है और कर्म अर्थ में प्रत्यय हुआ है तो कर्म उक्त तथा कर्ता अनुक्त होता है। कर्ता उक्त है तो कर्म आदि सारे स्वतः अनुक्त हो जायेगे। इस सूत्र से अनुक्त कर्म में ही द्वितीया विभक्ति होती है। यदि कर्म ही उक्त हो जाय तो कर्म में द्वितीया विभक्ति नहीं हो पाती। कर्म के उक्त हो जाने के बाद तो प्रातिपदिकार्थमात्र में प्रथमा विभक्ति ही होती है।
(देवदत्तः) हरिं भजति। देवदत्त हरि का भजन करता है। इस वाक्य में भज् धातु से लट् लकार अर्थात् ति कर्ता अर्थ में हुआ, अतः कर्ता उक्त है। कर्ता के उक्त होने से कर्म स्वतः अनुक्त हो जायेगा। इस वाक्य का कर्म क्या है? इस प्रश्न पर हमने कर्तुरीप्सिततं कर्म से पूछा तो उसने कहा- कर्ता को क्रिया के द्वारा प्राप्त करने में जो अत्यन्त इष्ट है, वही कर्म है। यहाँ पर कर्ता देवदत्त भजनक्रिया के द्वारा हरि को प्राप्त करना चाहता है, इसलिए हरि यह कर्म हुआ। कर्म अनुक्त है इसलिए हरि में कर्मणि द्वितीया से द्वितीया विभक्ति हुई। हरि से अम् और अमि पूर्वः से पूर्वरूप होकर हरिम् सिद्ध होता है। मकार को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार होकर वा पदान्तस्य से वैकल्पिक परसवर्ण हो जाता है तो हरिम्भजति बनता है। परसवर्ण न होने के पक्ष में हरिं भजति।
जब कोई विभक्ति प्राप्त न हो तो प्रातिपदिकार्थमात्र में प्रथमा विभक्ति हो जायेगी। जैसे हरिः सेव्यते इस वाक्य में सेव् धातु से कर्म अर्थ में प्रत्यय हुआ अतः कर्म उक्त हुआ। इसी प्रकार लक्ष्म्या सेवितो हरिः में क्त-प्रत्यय तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः से कर्म अर्थ में हुआ है। अतः कर्म के उक्त होने के कारण प्रातिपदिकार्थमात्र में प्रथमा विभक्ति होती है।
अनीप्सित कारक की भी कर्मसंज्ञा के लिए एक सूत्र है जो लघुसिद्धान्तकौमुदी में पठित नहीं है। वह है- तथायुक्तं चानीप्सितम्। तथायुक्तं प्रथमान्तं, च अव्ययपदम्, अनीप्सितं प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। कर्तुरीप्सिततमं कर्म यह सम्पूर्ण पूर्वसूत्र अनुवृत्त होता है। इस सूत्र के तथा इस पद से पूर्व सूत्र में कथित विषय का ग्रहण है। उस तरह के ईप्सिततम कर्म से युक्त अनीप्सित कारक की भी कर्मसंज्ञा होती है।
ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति। देवदत्त गाँव को जाता हुआ तिनके को छूता है। मुख्य क्रिया जाना है और अमुख्य क्रिया छूना है। अतः ईप्सिततम कर्म ग्राम है, अतः उसकी पूर्वसूत्र से ही कर्मसंज्ञा हो जाती है किन्तु गाँव जाते हुए तिनके को छूना तो ईप्सित नहीं है। अब उसमें कौन सी विभक्ति हो सकती है? इसी समस्या के समाधान के लिए यह सूत्र आकर अनीप्सित कारक तृण की भी कर्मसंज्ञा करता है जिससे कर्मणि द्वितीया से द्वितीया विभक्ति होकर तृणम् बन जाता है। ऐसे बहुत से उदाहरण मिल सकते हैं।