कर्तुः क्रियया आप्तुमिष्टतमं कारकं कर्मसंज्ञं स्यात्।
८९०- कर्तुरीप्सिततमं कर्म। अतिशयेन ईप्सितम् ईप्सिततमम्। कर्तुः षष्ठ्यन्तम्, ईप्सिततमं प्रथमान्तं, कर्म प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।
कर्ता को अपनी क्रिया के द्वारा अत्यन्त इष्ट अर्थात् जिसे विशेषरूप से प्राप्त करना चाहता है, उस कारक की कर्मसंज्ञा होती है।
एक वाक्य में कर्ता, कर्म और क्रिया ये तीन या तीन से अधिक भी होते हैं। इसमें कर्म कौन सा है? यह जानने के लिए इस सूत्र का सहारा लिया जाता है। जैसे रामः पुस्तकं पठति इस वाक्य में पठति यह क्रिया है और रामः यह कर्ता है। राम कर्ता को पठनक्रिया द्वारा अत्यन्त इष्ट है पुस्तक, अतः पुस्तक की कर्मसंज्ञा होती है। इसी प्रकार देवदत्तः पत्रं लिखति में कर्ता देवदत्त को लेखनक्रिया द्वारा अत्यन्त अभीष्ट है पत्र, अतः पत्र की कर्मसंज्ञा हुई। कर्मसंज्ञा का फल कर्मणि द्वितीया से द्वितीया विभक्ति का विधान करना है।