एषु कृजो णमुल स्यात्, सिद्धोऽप्रयोगोऽस्य एवम्भूतश्चेत् कृज्।
व्यर्थत्वात्प्रयोगानर्ह इत्यर्थः। अन्यथाकारम्। एवङ्कारम्। कथङ्कारम्।
इत्थङ्कारम्। भुङ्क्ते। सिद्धेति किम्? शिरोऽन्यथा कृत्वा भुङ्क्ते।
इत्युत्तरकृदन्तम्॥३६॥
८८७- अन्यथैवंकथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत्। अन्यथा च एवं च कथं च इत्थं च तेषामितरेतरद्वन्द्वः अन्यथैवंकथमित्थमस्तेषु। सिद्धोऽप्रयोगो यस्य स सिद्धाप्रयोगः। अन्यथैवंकथमित्थंसु
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सप्तम्यन्तं, सिद्धाप्रयोगः प्रथमान्तं, चेत् अव्ययपदं, त्रिपदं सूत्रम्। कर्मण्याक्रोशे कृञ् : खमुञ्
से कृञ् और स्वादुमि णमुल् से णमुल् की अनुवृत्ति आती है और धातोः, प्रत्ययः, परश्च
का अधिकार है।
अन्यथा, एवम्, कथम्, इत्थम् के उपपद होने पर कृञ् धातु से णमुल् प्रत्यय
होता है यदि कृञ् धातु अर्थहीन होने से प्रयोग के अयोग्य प्रतीत हो रहा हो तो।
सिद्धाप्रयोगः का तात्पर्य यह है कि यदि निष्पद्यमान शब्द में कृञ् धातु का अर्थ
न प्रतीत हो रहा हो।
अन्यथाकारं भुङ्क्ते। अन्य प्रकार से खा रहा है। एवङ्कारं भुङ्क्ते। इस प्रकार से
खाता है। कथङ्कारं भुङ्क्ते। कैसे खाता है? इत्थङ्कारं भुङ्क्ते। इस तरह से खाता है। इन चारों
प्रयोगों में कृ धातु है और क्रमशः अन्यथा, एवम्, कथम्, इत्थम् ये उपपद हैं। अन्यथाकारं
भुङ्क्ते का वही अर्थ है जो अन्यथा भुङ्क्ते का है। कृ धातु और उससे णमुल् प्रत्यय करके
भी वही अर्थ निकल रहा है, जो पहले से था। इस तरह यहाँ पर कृ धातु सिद्धाप्रयोग सिद्ध
हो रहा है। अतः कृ से अन्यथैवंकथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत् से णमुल् करके अन्यथाकारम्
बन जाता है। मकारान्त कृदन्त कृन्मेजन्तः से अव्ययसंज्ञक होता है। अतः सुप् का लुक् करके
अन्यथाकारम् सिद्ध होता है। इसी तरह एवङ्कारम्, कथङ्कारम् और इत्थङ्कारम् के सम्बन्ध
में भी समझना चाहिए।
सिद्धेति किम्? शिरोऽन्यथा कृत्वा भुङ्क्ते। प्रश्न यह कहते हैं कि अन्यथैवंकथमित्थंसु
सिद्धाप्रयोगश्चेत् इस सूत्र में यदि सिद्धाप्रयोगश्चेत् न हो तो क्या होता? इस पर उत्तर देते
हैं कि शिरोऽन्यथा कृत्वा भुङ्क्ते शिर को दूसरी तरफ करके भोजन करता है। इस वाक्य में
कृत्वा सिद्धाप्रयोग अर्थात् निष्प्रयोजन नहीं है, यहाँ पर भी णमुल् होकर अनिष्ट रूप बन
जाता। ऐसा न हो, इसके लिए सूत्र में सिद्धाप्रयोगश्चेत् यह कहा गया।
इस तरह से उत्तरकृदन्तप्रकरण को संक्षेप में पूर्ण किया गया। इतने प्रत्ययों की
सम्यक् जानकारी होने के बाद तो अन्य विविध प्रत्ययों की भी जानकारी सरलता से हो
सकती है। आपने अभी तक जितने धातु पढ़े, उन सभी धातुओं से तुमन् और क्त्वा प्रत्यय
लगाकर रूप बनाने का प्रयत्न करें।
परीक्षा
द्रष्टव्यः- प्रत्येक प्रश्न दस अंक के हैं और अनिवार्य भी हैं।
१- तुमन् और क्त्वा प्रत्यय लगाकर किन्हीं पाँच रूपों की सिद्धि करें।
१०
२- ल्यप् आदेश के किन्हीं दस रूपों की सिद्धि करें।
१०
३- घ और घञ् प्रत्यय लगाकर किन्हीं दस रूपों की साधना करें।
१०
४- क्तिन् प्रत्यय लगाकर दस रूपों की सिद्धि करें।
१०
५- क्त्वा, ल्यप् प्रत्यय के पाँच-पाँच तथा ण्यन्त से क्त्वा और ल्यप् के
दो-दो उदाहरण प्रक्रिया सहित दिखायें।
१०
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
उत्तरकृदन्त-प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ विभक्त्यर्थः