आभीक्ष्णये वीप्सायां च द्योत्ये पदस्य द्वित्वं स्यात्।
आभीक्ष्णयं तिङन्तेषु अव्ययसंज्ञकेषु च कृदन्तेषु च।
स्मारं स्मारं नमति शिवम्। स्मृत्वा स्मृत्वा वा। पायम्पायम्।
भोजम्भोजम्। श्रावं श्रावम्।
८८६- नित्यवीप्सयोः। नित्यं च वीप्सा च नित्यवीप्से, तयोः नित्यवीप्सयोः। सप्तम्यन्तं पदम्। पदस्य यह सूत्र अनुवृत्त होता है और सर्वस्य द्वे का अधिकार चल रहा है।
बार-बार होना और वीप्सा अर्थात् अनेक में व्याप्त होना अर्थ द्योतित होने पर पद को द्वित्व होता है।
आभीक्ष्णय का अर्थ द्वित्व और द्वित्व का तात्पर्य उस शब्द का दो बार पढ़ना अभिप्रेत है। यह द्वित्व तिङन्तों में, अव्यय में और कृदन्त पदों में होता है।
स्मारं स्मारं नमति शिवम्। शिव को बार बार स्मरण कर-कर के नमस्कार करता है। स्मृ चिन्तायाम्। यहाँ पर भी दो क्रियाएँ हैं। पूर्वकालिक क्रिया स्मृ और उत्तरकालिक क्रिया नमति। पूर्वकालिक धातु से आभीक्ष्णये णमुल च से णमुल होकर अनुवन्धलोप होने पर स्मृ+अम् बना। अचो ज्याति से वृद्धि होकर स्मार्+अम् बना। वर्णसम्मेलन होने पर स्मारम् बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, अव्ययसंज्ञा, विभक्ति और उसके लोप होने पर नित्यवीप्सयोः से स्मारम् का द्वित्व हो गया- स्मारम् स्मारम् बना। अब क्त्वा होने के पक्ष में तो स्मृत्वा स्मृत्वा बनेगा ही अर्थात् द्वित्व क्त्वा के पक्ष में भी होगा।
इसी तरह अन्य धातुओं से भी णमुल, क्त्वा और द्वित्व करके अनेक धातुओं से प्रयोग बना सकते हैं। कुछ उदाहरण यहाँ पर दिये जा रहे हैं।
पठ्
पाठं पाठम्, पठित्वा पठित्वा-
बार बार पढ़कर।
दृश्
दर्शं दर्शम्, दृष्ट्वा दृष्ट्वा-
बार बार देख कर।
ध्ये
ध्यायं ध्यायम्, ध्यात्वा ध्यात्वा
बार बार ध्यान कर।
खाद्
खादं खादम्, खादित्वा खादित्वा
बार बार खा कर।
कृ
कारं कारम्, कृत्वा कृत्वा
बार बार कर के।
पच्
पाचं पाचम्, पचित्वा पचित्वा
बार बार पका कर।