Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 37
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VṛttiGovind
LSK 888
प्रथमाविभक्तिविधायकं विधिसूत्रम्
प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा
Aṣṭādhyāyī 2.3.46
Vṛtti Varadarājācārya

नियतोपस्थितिकः प्रातिपदिकार्थः। मात्रशब्दस्य प्रत्येकं योगः।

प्रातिपदिकार्थमात्रे लिङ्गमात्राद्याधिक्ये परिमाणमात्रे सङ्ख्यामात्रे च प्रथमा स्यात्।

प्रातिपदिकार्थमात्रे- उच्चैः। नीचैः। कृष्णः। श्रीः। ज्ञानम्।

लिङ्गमात्रे- तटः, तटी, तटम्। परिमाणमात्रे- द्रोणो व्रीहिः।

वचनं सङ्ख्या- एकः, द्वौ, बहवः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब विभक्त्यर्थप्रकरण ( कारक ) प्रारम्भ होता है। आपने सन्धिप्रकरण के बाद अजन्तपुँल्लिङ्ग आदि छः प्रकरणों में सु आदि इक्कीस प्रत्ययों का विधान देखा। इन प्रत्ययों को सात विभक्तियों में विभाजित किया गया था। कौन सी विभक्ति किस अर्थ में होती है, यह बात इस कारकप्रकरण में बतायी जायेगी। अतः इस प्रकरण को विभक्त्यर्थप्रकरण भी कहते हैं। कारक शब्द ना एक अर्थ कर्ता भी है। किन्तु यहाँ पर कारक शब्द पारिभाषिक है। करोति क्रियां निर्वर्तयतीति कारकम्, अथवा क्रियान्वयि कारकम् अथवा साक्षात् क्रियाजनकं कारकम्। जो क्रिया का निमित्त बने अर्थात् जो क्रिया का निष्पादन करे, जो क्रिया के साथ अन्वय अर्थात् सीधे सम्बन्ध रखे अथवा जो क्रिया का जनक है, उसे कारक कहते हैं।

ये कारक छः हैं- कर्तृकारक, कर्मकारक, करणकारक, सम्प्रदानकारक, अपादानकारक और अधिकरणकारक। सम्बन्ध को कारक नहीं माना गया है, क्योंकि षष्ठी को छोड़कर अन्य सभी कारकों का क्रिया के साथ साक्षात् अन्वय है किन्तु सम्बन्ध का सीधे अन्वय न होकर परम्परा अन्वय होता है। जैसे रामः पठति में रामः कर्ता का पठति क्रिया के साथ साक्षात् सम्बन्ध है और कर्ता और क्रिया एक दूसरे से आकांक्षा युक्त हैं, अतः सीधे सम्बन्ध रखते हैं। इस तरह क्रिया के साथ अन्वय करने की योग्यता होने के कारण प्रथमाविभक्ति युक्त रामः यह कारक हुआ।

इसी प्रकार देवदत्तः पुस्तकं लिखति इस वाक्य में पुस्तकं इस कर्म का लिखति इस क्रिया के साथ में सीधे सम्बन्ध हो रहा है। पुस्तकं और लिखति के बीच में

.....

अन्य किसी शब्द की आवश्यकता नहीं है। इस तरह क्रिया के साथ अन्वय करने की योग्यता होने के कारण द्वितीयाविभक्तियुक्त पुस्तकम् यह कर्म-कारक हुआ।

गोपालः कराभ्यां प्रणमति (गोपाल दोनों हाथों से प्रणाम करता है) इस वाक्य में कराभ्यां इस करण साधन का प्रणमति इस क्रिया के साथ में सीधे सम्बन्ध हो रहा है। कराभ्यां प्रणमति के बीच में किसी अन्य शब्द की आवश्यकता नहीं है। इस तरह क्रिया के साथ अन्वय करने की योग्यता होने के कारण तृतीयाविभक्तियुक्त कराभ्याम् यह करण-कारक हुआ।

राजा धनं निर्धनाय ददाति या राजा निर्धनाय धनं ददाति (राजा धन निर्धन को देता है या राजा निर्धन को धन देता है) इस वाक्य में निर्धनाय इस सम्प्रदान का सीधा सम्बन्ध ददाति क्रिया के साथ हो रहा है। निर्धनाय और ददाति के बीच अन्य कोई शब्द न हो तो भी वाक्य की संगति बैठ जाती है। क्रिया के साथ अन्वय करने की योग्यता होने के कारण चतुर्थीविभक्तियुक्त निर्धनाय यह सम्प्रदान-कारक हुआ।

छात्राः पाठालयाद् आगच्छन्ति (छात्र पाठशाला से आ रहे हैं) इस वाक्य में पाठालयात् इस अपादान का आगच्छन्ति इस क्रिया के साथ में सीधे सम्बन्ध अर्थात् अन्वय हो रहा है। पाठालयात् और आगच्छन्ति के बीच में अन्य किसी शब्द की आवश्यकता नहीं है। इस तरह क्रिया के साथ अन्वय करने की योग्यता होने के कारण पञ्चमीविभक्तियुक्त पाठालयात् यह अपादान-कारक हुआ।

देवदत्तस्य पुत्रः शाकम् आनयति (देवदत्त का पुत्र शाक लाता है) इस वाक्य में देवदत्तस्य यह षष्ठीविभक्ति युक्त शब्द का आनयति क्रिया के साथ में सीधे अन्वय नहीं हो रहा है। देवदत्त का लाता है, ऐसा वाक्य ही नहीं बनता है। देवदत्त का और लाता है के बीच में किसी अन्य शब्द की आवश्यकता होती है। इस तरह क्रिया के साथ साक्षात् अन्वय करने की योग्यता न होने के कारण षष्ठीविभक्तियुक्त देवदत्तस्य यह कोई कारक नहीं हुआ।

बालकः कटे तिष्ठति (बालक चटाई पर बैठता है) इस वाक्य में कटे इस अधिकरण का सम्बन्ध तिष्ठति क्रिया के साथ सीधे हो रहा है। कटे और तिष्ठति के बीच में अन्य किसी शब्द की आवश्यकता नहीं है। इस तरह क्रिया के साथ अन्वय करने की योग्यता होने के कारण सप्तमीविभक्तियुक्त कटे यह अधिकरण-कारक हुआ।

विवक्षातः कारकाणि भवन्ति। वक्ता जिस प्रकार से अर्थात् जिस प्रकार के भाव से किसी को प्रस्तुत करना चाहता है या प्रस्तुत करता है, यह उसकी इच्छा पर निर्भर है। वह अग्निः पचति या अग्निना पचति आदि किस रूप में प्रयोग करना चाहता है, उसी रूप में प्रयोग कर सकता है।

वाक्यज्ञान के लिए कारकप्रकरण का विशेष महत्त्व है। इसके विना वाक्य शुद्ध होना कठिन है। वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में कारकप्रकरण विस्तृत रूप में है किन्तु लघुसिद्धान्तकौमुदी में केवल दिग्दर्शन मात्र कराया गया है। फिर भी व्याख्या में प्रयत्न करेंगे कि बोलचाल के लिए आवश्यक कारक का समावेश हो जाय।

८८८- प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा। इस सूत्र का सामासिक विग्रह कुछ इस प्रकार से है- पदं पदं प्रतिपदं, प्रतिपदे भवं प्रातिपदिकं, प्रातिपदिकस्यार्थः प्रातिपदिकार्थः। प्रातिपदिकार्थश्च, लिङ्गञ्च, परिमाणञ्च, वचनञ्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः

.....

प्रातिपदिकार्थलिङ्ग-परिमाणवचनानि, प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनानि एव

प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रम्, तस्मिन् प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे, प्रथमा।

प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे सप्तम्यन्तं, प्रथमा प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।

प्रातिपदिकार्थमात्र में, लिङ्गमात्र की अधिकता में, परिमाणमात्र में और वचन में प्रथमा विभक्ति होती है।

नियतोपस्थितिकः प्रातिपदिकार्थः। किसी शब्द के उच्चारण करने पर निश्चितरूप से जिस अर्थ की उपस्थिति हो अर्थात् प्रतीति होती है उसे प्रातिपदिकार्थ कहते हैं। जिस शब्द के उच्चारण करने से यह पता चले कि यह शब्द इस अर्थ का ज्ञान करता है, अथवा इस शब्द का यह अर्थ है, ऐसी प्रतीति जिस शब्द के विषय में हो जाये, उसे प्रातिपदिकार्थ कहते हैं।

सूत्र में जो मात्र-शब्द उच्चारित है। वह अवधारणार्थक है। इसमें चार मानक निश्चित किये गये हैं- प्रातिपदिकार्थ, लिङ्ग, परिमाण और वचन। इन चारों के साथ में मात्रशब्द का सम्बन्ध है। द्वन्द्वादौ द्वन्द्वमध्ये द्वन्द्वान्ते च श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बध्यते। द्वन्द्वसमास के आदि, मध्य और अन्त में पढ़ा गया शब्द द्वन्द्व के विग्रह में उच्चारित सभी शब्दों के साथ लग जाता है। द्वन्द्वसमास करके प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनानि बनाया गया है और इसके अन्त में मात्र को जोड़ा जा रहा है, अतः मात्र का योग प्रातिपदिकार्थ के साथ भी, लिङ्ग के साथ भी, परिमाण के साथ भी और वचन के साथ भी हो जाता है। इसका यह अर्थ निकलता है-

प्रातिपदिकार्थ में ही, प्रातिपदिकार्थ होते हुए लिङ्गमात्र की अधिकता होने पर, प्रातिपदिकार्थ होते हुए परिमाणमात्र की अधिकता होने पर और प्रातिपदिकार्थ होते हुए संख्यामात्र भी रहने पर प्रथमा विभक्ति होती है।

प्रातिपदिकार्थमात्र तो सब में रहता ही है।

शब्दों से विभक्ति आना आवश्यक है, क्योंकि विभक्ति लगने के बाद सुप्तिङन्तं पदम् से पदसंज्ञा होती है। पद होने पर ही वह व्यवहार के योग्य हो जाता है। अपदं न प्रयुज्जीत अर्थात् अपद का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जैसे- श्री शब्द है। जब तक इसमें विभक्ति नहीं लगाते तब तक उसका प्रयोग नहीं हो सकता। केवल वैयाकरण लोग विना विभक्ति के भी अर्थ समझेंगे किन्तु जो व्याकरण की प्रक्रिया को नहीं समझते, वे विभक्त्यन्त शब्द का ही अर्थ समझ सकते हैं। जैसे केवल भू-धातु का लोक में कोई अर्थ गम्य नहीं है किन्तु जब लट्, तिप्, शप्, गुण, अवादेश करके भवति बन जाता है तब उसका अर्थ सभी समझ सकते हैं। इसी प्रकार विना विभक्ति के कोई अर्थ नहीं समझ सकता। अतः पद बने विना उसका प्रयोग नहीं होता। पद बनने के लिए तिङ् आदि विभक्ति या सुप् आदि विभक्तियों का होना आवश्यक है। सुप् आदि विभक्ति कहाँ-कहाँ किस-किस प्रकार से की जायें, यही अर्थ निश्चय करता है कारकप्रकरण अर्थात् विभक्त्यर्थप्रकरण।

प्रातिपदिकार्थमात्रे। जिस शब्द का सीधा-सीधा अर्थमात्र उपस्थित है, ऐसे शब्द से प्रथमाविभक्ति होती है अर्थात् किसी शब्द के उच्चारण करने पर नियतरूप से जिस अर्थ की उपस्थिति हो अर्थात् प्रतीति होती हो ऐसे प्रातिपदिकार्थ से प्रथमाविभक्ति होने का उदाहरण है- उच्चैः, नीचैः, कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम्। इन शब्दों के उच्चारणमात्र से क्रमशः

ऊपर, नीचे, भगवान् कृष्ण, लक्ष्मी जी और ज्ञान ये अर्थ अपने आप किसी अन्य शक्ति के विना भी उपस्थित हो रहे हैं। इसलिए यहाँ पर प्रातिपदिकार्थ माना गया और प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा से प्रथमाविभक्ति हुई।

उच्चैः। नीचैः। उच्चैस् और नीचैस् इन दो प्रातिपदिकों से प्रातिपदिकार्थ मात्र में प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा से प्रथमाविभक्ति हुई, सु प्रत्यय उपस्थित हुआ। ये दोनों शब्द अव्ययसंज्ञक हैं, अतः अव्ययादाप्सुपः से सु विभक्ति का लोप हुआ। उच्चैस् और नीचैस् के सकार को रुत्वविसर्ग हुआ। सु के लोप होने पर भी प्रत्ययलक्षण के द्वारा विभक्त्यन्त माना गया। विभक्त्यन्त होने से पदसंज्ञा हो गई। पद होने से प्रयोग योग्य हो गये।

कृष्णः। कृष्ण का वासुदेव अर्थ निश्चित रूप से उपस्थित है। अतः प्रातिपदिकार्थ है। प्रातिपदिकार्थ में प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा से प्रथमाविभक्ति हुई। एकत्व की विवक्षा में द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने से एकवचन सु आया। अनुबन्धलोप होने पर सकार को रुत्वविसर्ग हुआ- कृष्णः।

श्रीः। श्री शब्द के उच्चारण से लक्ष्मी यह अर्थ निश्चित रूप से उपस्थित है। अतः प्रातिपदिकार्थ हुआ। प्रातिपदिकार्थ में प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा से प्रथमाविभक्ति हुई। एकत्वविवक्षा में सु आया, उसको रुत्वविसर्ग हुआ- लक्ष्मीः। लक्ष्मी-शब्द न तो उच्यन्त है और न आबन्त ही। अतः हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से सु का लोप नहीं हुआ। शेष विभक्ति में नदी-शब्द की तरह रूप चलते हैं।

ज्ञानम्। ज्ञानशब्द का ज्ञान, विद्या की सम्पन्नता अर्थ निश्चित रूप से उपस्थित है। अतः प्रातिपदिकार्थ है। प्रातिपदिकार्थ में प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा से प्रथमाविभक्ति हुई। एकत्वविवक्षा में सु आया। नपुंसकलिङ्ग होने के कारण सु के स्थान पर अतोऽम् से अम् हुआ और अमि पूर्वः से पूर्वरूप हुआ- ज्ञानम्।

लिङ्गमात्राधिक्ये। कोई शब्द केवल अपने लिङ्ग को नहीं कह सकता अपितु लिङ्गविशिष्ट प्रातिपदिकार्थ को ही कहता है। जैसे पुरुषशब्द पुँल्लिङ्गयुक्त मनुष्यरूप प्रातिपदिकार्थ को, नारी-शब्द स्त्रीलिङ्गयुक्त नारी रूप प्रातिपदिकार्थ को तथा पुस्तकशब्द नपुंसकलिङ्गयुक्त पुस्तक रूप अर्थ को अवश्य कहते हैं किन्तु तट शब्द से उसमें विद्यमान बहुत लिङ्गों में से एक कोई लिङ्गयुक्त नदी का तीर अर्थ तो उपस्थित है किन्तु अनेक लिङ्ग अर्थ उपस्थित नहीं हैं। इसलिए प्रातिपदिकार्थ में प्रथमा नहीं हो सकती है। अतः प्रातिपदिकार्थ होते हुए लिङ्गमात्र की अधिकता हो तो भी प्रथमा विभक्ति हो, इसके लिए इस सूत्र में लिङ्ग ग्रहण किया गया है।

तटः, तटी, तटम्। अकारान्त तट-शब्द से प्रातिपदिकार्थ सहित लिङ्गमात्र की अधिकता में प्रथमाविभक्ति हुई। पुँल्लिङ्ग में रामशब्द की तरह, स्त्रीलिङ्ग में नदीशब्द की तरह और नपुंसकलिङ्ग में ज्ञान-शब्द की तरह प्रक्रिया होती है।

परिमाणमात्राधिक्ये। कहीं पर भी किसी शब्द से केवल परिमाण की अभिव्यक्ति नहीं हुआ करती अपितु प्रातिपदिकार्थ सहित परिमाण की अभिव्यक्ति हुआ करती है। अतः प्रातिपदिकार्थ सहित परिमाणमात्र की अधिकता होने पर प्रथमाविभक्ति होवे, इसलिए परिमाणमात्राधिक्ये कहा गया। जैसे द्रोणो व्रीहिः। द्रोण प्राचीनकाल का एक परिमाणवाचक

शब्द है, जैसे आजकल किलो, कुन्टल आदि है। द्रोण का अर्थ परिमाण-विशेष और इस सूत्र से परिमाणाधिक्य में जो सु प्रत्यय हुआ, उसका परिमाण सामान्य अर्थ है। जैसे एक किलो चावल इस वाक्य में नाप सामान्य परिमाण और एक किलो विशेष परिमाण, इस तरह से एक किलो से नपा हुआ चावल यह तात्पर्य निकलता है। इसी प्रकार से द्रोण का अर्थ भी परिमाण है और परिमाण अर्थ में हुए सु का अर्थ भी परिमाण ही है। दो परिमाणों में द्रोण का परिमाण अर्थ विशेषण और सु का परिमाण अर्थ विशेष्य है। पुनः द्रोणः विशेषण और व्रीहिः विशेष्य हुए। इस तरह से द्रोण के रूप में जो परिमाण, उस परिमाण से नपा हुआ धान यह अर्थ निश्चित हुआ। व्रीहिः में सु विभक्ति प्रातिपदिकार्थमात्र में और द्रोणः में सु विभक्ति प्रातिपदिकार्थमात्र रहते हुए परिमाणमात्र की अधिकता में हुई है, ऐसा समझना चाहिए।

यदि यहाँ पर परिमाण अर्थ में विभक्ति न की जाय तो अर्थात् प्रातिपदिकार्थ में ही विभक्ति मानी जाय तो द्रोणो व्रीहिः में द्रोण किसी वस्तु का मापक परिमाण का व्रीहि- धान्यविशेष जो माप्य=नापा जाने वाले के साथ परिच्छेद्य-परिच्छेदक (माप्य-मापक)भाव रूप सम्बन्ध नहीं होगा अपितु नीलो घटः की तरह अर्थात् नीलाभिन्नो घटः=नील गुण से अभिन्न घट की तरह द्रोण से अभिन्न व्रीहि ऐसे अभेद सम्बन्ध से अन्वय होने लगता, क्योंकि नामार्थयोरभेदान्वयः=एक नामार्थ=प्रातिपदिकार्थ का दूसरे नामार्थ के साथ में अभेदान्वय ही होता है, ऐसा नियम है। जो द्रोणो व्रीहिः में कथमपि सम्भव नहीं है क्योंकि- द्रोण नापने वाला मापक है और व्रीहि उससे नापी जाने वाली माप्य वस्तु है। द्रोण परिमाण और व्रीहि द्रव्य कभी भी एक नहीं हो सकते। अतः अभेदान्वय को बाधकर परिच्छेद्य-परिच्छेदकभाव रूप सम्बन्ध से अन्वय करने के लिए परिमाण अर्थ प्रथमा की जाती है।

संख्यामात्रे। एकः, द्वौ, बहवः। जैसे एक शब्द से एकत्व संख्या, द्वि शब्द से द्वित्व संख्या और बहु शब्द से बहुत्व संख्या का अर्थ स्वतः उपस्थित है। तात्पर्य यह है कि एक, द्वि, बहु आदि संख्यावाचक शब्दों से संख्या-अर्थ जो प्रातिपदिकार्थ है, वह उक्त है और उस उक्त अर्थ को बताने के लिए सु, औ आदि प्रत्यय नहीं किये जा सकते क्योंकि- उक्तार्थानामप्रयोगः, उक्तः=कहा गया है, अर्थः=अर्थ, जिन शब्दों का, ऐसे शब्दों का, अप्रयोगः=प्रयोग नहीं किया जा सकता, ऐसा नियम है। अतः एक, द्वि आदि से एकत्व, द्वित्व आदि संख्या रूप अर्थ के उक्त होने पर भी वचन-ग्रहणसामर्थ्य से उक्तार्थानामप्रयोगः इस नियम को बाधकर सु आदि प्रत्यय होते हैं। इसलिए संख्यामात्रे का उच्चारण किया। एक, द्वि, बहु ये स्वतः संख्यावाचक होते हुए भी में प्रथमा विभक्ति होनी ही चाहिए जिससे ये पद बन सकें। इन तीनों शब्दों से प्रातिपदिकार्थमात्र होते हुए संख्यामात्र की विशेषता में प्रातिपदिकार्थलिङ्ग- परिमाणवचनमात्रे प्रथमा से प्रथमाविभक्ति हुई। एक+सु

में रुत्वविसर्ग करके एकः। द्वि+औ में त्यदादीनामः से अत्व, द्व+औ बना। वृद्धि होकर द्वौ बना। बहु+जस् में जसि च से गुण करके अवादेश, रुत्वविसर्ग करके बहवः सिद्ध हुआ। ८८९- सम्बोधने च। सम्बोधने सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा से प्रथमा की अनुवृत्ति आती है।