Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 885
णमुलप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
आभीक्ष्ण्ये णमुल् च
Aṣṭādhyāyī 3.4.22
Vṛtti Varadarājācārya

आभीक्ष्णे द्योत्वे पूर्वविषये णमुल् स्यात् क्वा च।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८८५- आभीक्ष्णये णमुल् च। आभीक्ष्णये सप्तम्यन्तं, णमुल् प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदं सूत्रम्। समानकर्तृकयोः पूर्वकाले से पूर्वकाले और अलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा से क्त्वा की अनुवृत्ति आती है तथा धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।

समान कर्ता वाले दो धातुओं में पूर्वकालिक धातु से णमुल् और क्त्वा प्रत्यय होते हैं बार-बार होना अर्थ द्योतित होने पर।

यह भी क्त्वा का ही विषय है। इसमें दोनों प्रत्यय बारी-बारी से होते हैं। अर्थ में क्रिया का बारम्बार होना द्योतित होना चाहिए। णमुल् में आदि णकार की चुटू से और अन्त्य लकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है। उकार उच्चारणार्थ लगाया गया है। इस तरह केवल अम् शेष रहता है। णित् होने से वृद्धि हो जायेगी। इस प्रत्यय के लगने के बाद वह प्रातिपदिक मान्त कृत् हो जाता है, जिससे कृम्मेजन्तः से अव्ययसंज्ञा होती है। फलतः उसके बाद की विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् हो जाता है।