अव्ययपूर्वपदेऽनञ्समासे क्त्वो ल्यबादेशः स्यात्। तुक्।
प्रकृत्या। अनञ् किम्? अकृत्वा।
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८८४- समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्। न नञ् अनञ्, अनञ् पूर्व यस्मिन् स अनञ्पूर्वः, तस्मिन्। समासे सप्तम्यन्तम्, अनञ्पूर्वे सप्तम्यन्तं, क्त्वः षष्ठ्यन्तं, ल्यप् प्रथमान्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्।
जिस समास के पूर्वपद में नञ् से भिन्न कोई अन्य अव्यय स्थित हो तो उस समास में धातु से परे क्त्वा के स्थान पर ल्यप् आदेश होता है।
नञ् अव्यय है। अनञ् कहने से नञ् से भिन्न और नञ् के समान अव्यय अर्थ लिया गया है। अर्थात् समास के पूर्वपद में नञ् से भिन्न अन्य कोई अव्यय हो तो उत्तरपदस्थ अर्थात् धातु से परे क्त्वा प्रत्यय के स्थान पर ल्यप् आदेश हो जाता है। लकार और पकार इत्संज्ञक हैं, य बचता है। जैसे क्त्वा प्रत्यय कृत्संज्ञक, आर्धधातुक और कित् है, उसी प्रकार उसके स्थान पर होने वाला ल्यप् भी स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ से स्थानिवदभाव करके कृत्संज्ञक, आर्धधातुक और कित् माना जायेगा। अल्विधि होने के कारण वलादिलक्षण
इट् का अनल्विधौ से निषेध हो जायेगा। अतः इट् की कर्तव्यता में स्थानिवद्भाव ही नहीं होगा अन्यत्र हो जायेगा। इतना ध्यान रखना कि ल्यप् आदेश होने पर धातु से इट् का आगम नहीं होता। नञ् से भिन्न अव्ययों का कृत्संज्ञक क्त्वाप्रत्ययान्त के साथ कुगतिप्रादयः से समास करने के बाद ही इस सूत्र की प्रवृत्ति होती है।
प्रकृत्य। प्र पूर्वक कृ धातु से समानकर्तृकयोः पूर्वकाले से क्त्वा प्रत्यय, ककार का लोप, प्र+कृ+त्वा बना। अनिट् धातु होने के कारण इट् प्राप्त ही नहीं है। त्वा की आर्धधातुकसंज्ञा, गुण प्राप्त, कित् होने के कारण विडन्ति च से गुण का निषेध, प्र+कृत्वा में उपपदसमास करके समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् से त्वा के स्थान पर ल्यप् आदेश, अनुबन्धलोप, प्रकृ+य बना। ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् से कृ को तुक् का आगम करके प्रकृत्य बन जाता है। क्त्वातोसुन्कसुनः से अव्ययसंज्ञा होती है। प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु आदि विभक्ति की उपस्थिति, उनका अव्ययादाप्सुपः से लुक् हो जाता है। प्रकृत्य।
अन्य उदाहरण- सङ्गम्य। सम् पूर्वक गम् धातु से समानकर्तृकयोः पूर्वकाले से क्त्वा प्रत्यय, ककार का लोप, सम्+गम्+त्वा बना। अनिट् धातु होने के कारण इट् प्राप्त ही नहीं है। सम्+गम्+त्वा में समास करके समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् से त्वा के स्थान पर ल्यप् आदेश, अनुबन्धलोप, सम्+गम्+य बना। सम् के मकार को अनुस्वार और परसवर्ण करके डकार बन गया, सङ्गम्+य बना। वर्णसम्मेलन होकर सङ्गम्य बन गया। इसके बाद क्त्वातोसुन्कसुनः से अव्ययसंज्ञा होती है। प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति की उपस्थिति, उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् होकर- सङ्गम्य सिद्ध हुआ।
अकृत्वा। (नञ्) न+कृत्वा में समास करके अ+कृत्वा बना है। नञ् पूर्व में होने पर सूत्र ने ल्यप् आदेश का निषेध किया है, अतः यहाँ पर ल्यप् आदेश नहीं हुआ, क्त्वा ही रह गया- अकृत्वा।
हम यहाँ कुछ धातुओं में क्त्वा प्रत्यय और ल्यप् आदेश लगाकर लिख रहे हैं। आप इनकी प्रक्रिया को समझें और अन्य धातुओं से भी क्त्वा-ल्यप् लगाकर रूप सिद्ध करने का प्रयत्न करें। अधिकतर धातुओं में उपसर्ग के लगने के बाद अर्थ भी बदल जाता है। अतः हम ने यहाँ पर क्त्वान्त और ल्यबन्त दोनों का अर्थ बदलने की स्थिति में क्रमशः दोनों अर्थों को दिखाया है।
अर्च-अर्चित्वा-समर्च्य=पूजकर के
अव्-अवित्वा-समव्य=वचाकर के
आप्-आप्त्वा- प्राप्य=पाकर के
कृ-कृत्वा-सङ्कृत्य=कर के
क्रीड्-क्रीडित्वा-सङ्क्रीड्य=खलकर
खेल्-खेलित्वा-सङ्खेल्य=खेलकर के
गै, गा-गीत्वा-प्रगाय=गाकर के
चल्-चलित्वा-सञ्चल्य=चलकर के
जप्-जपित्वा-प्रजप्य=जपकर के
जि-जित्वा-विजित्य=जीतकर के
ज्ञा-ज्ञात्वा-विज्ञाय=जानकर के
दा-दत्त्वा-प्रदाय=देकर के
अर्ज-अर्जयित्वा-उपार्ज्य=कमाकर के
अस्-भूत्वा-अनुभूय=होकर, अनुभवकर के
कथ्-कथयित्वा-प्रकथय्य=कहकर के
क्री-क्रीत्वा-विक्रीय=खरीदकर, बेचकर के
खाद्-खादित्वा-प्रखाद्य=खाकर के
गम्-गत्वा-अवगम्य= जानकर के
ग्रह्-गृहीत्वा-सङ्गृह्य=ग्रहणकर के
जन्-जनित्वा-सञ्जाय=पैदा होकर के
जागृ-जागरित्वा-प्रजागर्य=जागकर के
जीव्-जीवित्वा-सञ्जीव्य=जीकर के
त्यज्-त्यक्त्वा-परित्यज्य=छोड कर के
दृश्-दृष्ट्वा-सन्दृश्य=देखकर के
धाव्-धावित्वा-प्रधाव्य=दौड़कर के
धृ-धृत्वा-प्रधृत्य=धारणकर के
ध्यै, ध्या-ध्यात्वा-सन्ध्याय=ध्यानकर के
नम्-नत्वा-प्रणम्य=झुककर, प्रणामकर के
नी-नीत्वा-आनीय=ले जाकर, लाकर
पच्-पक्त्वा-प्रपच्य=पकाकर के
पठ्-पठित्वा-प्रपठ्य=पढ़कर के
पत्-पतित्वा, निपत्य=गिरकर के
पा-पीत्वा-प्रपाय=पीकर के
पूज्-सम्पूज्य=पूजकर के
भक्ष्-भक्षयित्वा-आभक्ष्य=खाकर
भण्-भणित्वा-आभण्य=कहकर के
भाष्-भाषित्वा-सम्भाष्य=बोलकर के
भुज्-भुक्त्वा, उपभुज्य=खाकर के
भू-भूत्वा-सम्भूय=होकर के, सम्भव होकर के, रक्ष्-रक्षित्वा-संरक्ष्य=रक्षाकर के
रम्-रमित्वा-विरम्य=रमणकर, रूककर के, रुद्-रुदित्वा-प्ररुद्य=रोकर के
लभ्-लब्ध्वा-उपलभ्य=पाकर के
लिख्-लिखित्वा-आलिख्य=लिखकर के
विद्-विदित्वा-संविद्य=जानकर के
वृध्-वर्धित्वा-संवृध्य=बढ़कर के
शक्-शक्त्वा-अतिशक्य=सककर के
शिक्ष्-शिक्षित्वा-प्रशिक्ष्य=सीखकर के
श्रु-श्रुत्वा-विश्रुत्य=सुनकर के
सेव्-सेवित्वा-संसेव्य=सेवाकर के
स्तु-स्तुत्वा-संस्तुत्य=स्तुतिकर के
स्था-स्थित्वा-उत्थाय=रहकर के, उठकर के
स्पृश्-स्पृष्ट्वा-संस्पृश्य=छूकर के
स्ना-स्नात्वा-प्रस्नाय=नहाकर के
स्मृ-स्मृत्वा-संस्मृत्य=यादकर के
स्वप्-सुप्त्वा-प्रसुप्य=सोकर के
हन्-हत्वा-निहत्य=मारकर के
हस्-हसित्वा-विहस्य=हसकर के
हृ-हृत्वा-आहृत्य=हरकर, लाकर के
आ-ह्वे-आहूय=बुलाकर के
अध्यापि-अध्याप्य- पढ़कर के
दर्शयित्वा-आदर्श्य=दिखाकर के
श्रावयित्वा-संश्राव्य=सुनाकर के
घातयित्वा-संघात्य=मरवाकर के
ग्राहयित्वा-सङ्ग्राह्य=ग्रहण कराकर
प्रसादयित्वा-प्रसाद्य=प्रसन्नकर के
कारयित्वा-प्रकार्य=करवाकर के
लेखयित्वा-संलेख्य=लिखवाकर के