Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 883
ह्यादेशविधायकं विधिसूत्रम्
जहातेश्च क्त्वि
Aṣṭādhyāyī 7.4.43
Vṛtti Varadarājācārya

हित्वा। हाङस्तु- हात्वा।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८८३- जहातेश्च क्त्वि। जहातेः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, क्त्वि सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। दधातेर्हिः से हिः की अनुवृत्ति आती है।

क्त्वा प्रत्यय के परे होने पर दिवादिगणीय हा धातु के स्थान पर भी हि आदेश होता है।

जहातेः से केवल जुहोत्यादिगणीय ओहाक् त्यागे का ही ग्रहण है, ओहाङ् गतौ का नहीं।

हित्वा। छोड़कर। ओहाक् त्यागे। अनुबन्धलोप के बाद हा बचता है। इससे क्त्वा होने पर हा+त्वा बना। यह धातु एकाच् उपदेशेऽनुदात्तात् से अनिट् है। जहातेश्च क्त्वि से हा के स्थान पर हि आदेश होकर हित्वा सिद्ध हुआ। ओहाङ् वाले हा के स्थान पर यह आदेश नहीं होगा। अतः हात्वा ही रह जाता है।